बुधवार, 30 जून 2021

वर्षण किसे कहते हैं ,फुहार किसे कहते हैं ,ओलावृष्टि किसे कहते है , ओस क्या है , कुहासा क्या है ,कोहरा क्या है

        वर्षण किसे कहते है 







  जब जलवाष्प से मिश्रित वायु  ऊपर उठती है | तो तापमान में कमी आती है | जिसके कारण उसका संघनन होना प्रारंभ हो जाता है |  जलवाष्प   के संघनन के बाद  नमी से मुक्त होती है |  इस  अवस्था को वर्षण  कहा जाता है  | 

          वर्षण  निम्म प्रकार  की होती है  

                     (1)  फुहार 

इस प्रकार के  वर्षण में बूंदो का आकार काफी छोटा है  लेकिन  वर्षा सघन होती है | 

                       ( 2 ) सहिम वर्षा 

 यदि वर्षण  के फलस्वरूप  जल बूंदों के साथ-साथ अर्ध्द हिमित या हिमित कणो  की  भी  वर्षा हो तो उसे सहिम वर्षा कहा जाता है | 

                        (3) हिमपात 

यदि वर्षणके फलस्वरूप हिमकणों की वर्षा होती है | तो उसे हिमपात कहा जाता है | ऐसा तब होता है | जब संघनन  जमाव विन्दु से निचे होता है | जिसके कारण वाष्प  से  हिम के  छोटे छोटे कण बन जाता है | सामान्यतः ये छोटे छोटे कण आपस में मिल जाता है | और विभिन्न आकारों में गिरता है जिसे हिमपात कहा जाता है | 

                      ( 4 )  ओलावृष्टि

यदि वर्षण  के फलस्वरूप  हीम -  गोले बन जाता है | तो उन्हें ओले  तथा भू पृष्ठ पर इसके गिरने को ओलावृष्टि कहा जाता है | 

                        ( 5 ) ओस 

 वनस्पति तथा अन्य वस्तुओं के ऊपर जलकण के रूप में संग्रहित आर्द्रता को ओस कहा जाता है रात में पार्थिव विकिरण के कारण तापमान में  कमी आती है | जिससे वायुमंडल  की  निचली   परतो  का तापमान  को ओसांक  बिंदु से नीचे चला जाता है | तथा संघनन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है | इस प्रकार संघनन  द्वारा उत्पन्न जल पौधे तथा अन्य वस्तुओं के ऊपर जलकण के रूप में  एकत्रित हो जाता है | 

                         (6) तुषार 

 जब कभी तापमान हिमांक बिंदु से नीचे चला जाता है तब तुषार का निर्माण होता है |

                        ( 7) कुहासा 

 कुहासा का निर्माण  आर्द्र सतह  झील तथा नदियों के ऊपर होता है | कुछ आर्द्रता वाले क्षेत्र में शाम के समय संघनन की प्रक्रिया के कारण आसपास के क्षेत्रों तथा जल पिंडों के ऊपर शरण स्थलों पर कुहासा का निर्माण होता है |

                         ( 8 )  कोहरा 

 कुहासा के  कारण  जब दृश्यता  एक  किलोमीटर  तक ही रह जाती है |  तो  इस अवस्था को कोहरा कहा जाता है  | कोहरे का निर्माण शीतलीकरण  एवं वाष्पीकरण  दोनों प्रक्रिया के कारण होता है |



मंगलवार, 29 जून 2021

चक्रवात किसे कहते हैं

       चक्रवात किसे कहते हैं






 चक्रवात का समान्य अर्थ है  चक्करदार हवाओं से है | यह एक न्यूनतम वायु भार का ऐसा क्षेत्र होता है | जिसके  केंद्र से बाहर की ओर वायुदाब क्रमश: बढ़ता जाता है | इसकी समभार रेखाएं संकेंद्रीय होती है जिसके कारण परिधि से केंद्र की ओर हवाएं चलने लगती है | उत्तरी गोलार्ध में चक्रवात मे वायु की दिशा घड़ी की  सुई की विपरीत तथा दक्षिणी गोलार्ध में घड़ी की  सुई की दिशा में घूमती हुई न्यूनतम भार वाले केंद्र की ओर पहुंचती है |

 स्थिति के दृष्टिकोण से चक्रवातो को दो वर्गों में बांटा गया है

                  शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात

 वैसे चक्रवातीय  वायु प्रणालीयाँ जो  उष्ण  कटिबंध से दूर मध्य व उच्च अक्षांशो में विकसित होती है | उसे शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात कहा जाता है  इसके केंद्र  तथा बाहर की ओर स्थित दाब में 10 से 20 mb  तथा कभी-कभी 35 mb  का अंतर होता है इसका भ्रमण  तथा पछुआ  पवनों के सहारे पश्चिम से पूर्व दिशा में होता है | जाड़े  के समय में इसकी गति भी तीव्र हो जाती है | चक्रवातो  में  समदाब दिखाओ की आकृति अंडाकार या उलटे V  आकार  के होते हैं |  इस के आगमन की सूचना पक्षाभ व पक्षाभ स्तरी मेघों के कारण सूर्य के चारो ओर बने प्रभामण्डल  से मिलती है |इस  चक्रवात के उत्तरी गोलार्ध में उत्पत्ति के दो मुख्य केंद्र  

    (i)  उत्तरी अमेरिका का उत्तर - पूर्वी तटीय भाग

    (ii)  एशिया का उत्तर - पूर्वी तटीय भाग

                       उत्पत्ति एवं जीवन चक्र  

 इसकी उत्पत्ति  का संबंध वाताग्रो  से होता है | जहां पर दो हवाओं के मिलने से इसकी उत्पत्ति होती है | इसकी उत्पत्ति के संबंध में बर्कनीज का  ध्रुवीय वाताग्र सिद्धांत  सर्वाधिक मान्य है | जिसके जीवन चक्र की छह क्रमिक अवस्थाएं है |

 प्रथम अवस्था में ठंडी व गर्म वायुराशियाँ एक दूसरे से समानांतर चलती है जिससे स्थाई वाताग्र का निर्माण  होता है |

 दूसरी अवस्था में दोनों वायु राशियां  एक दूसरे के प्रदेश में प्रविष्ट करने  का प्रयास करते हैं जिससे  लहरनुमा वाताग्र  का निर्माण होता है |

 तीसरी अवस्था में उष्ण और शीत वाताग्रो का पूर्ण विकास  होता है | इसमें चक्रवात का पूर्ण रूप प्राप्त हो जाता है |

 चौथी अवस्था में स्थित वाताग्र  के तेजी से आगे बढ़ने के कारण उष्ण वृतांश संकुचित होने लगता है |

 पांचवी अवस्था में चक्रवात का अवसान होना शुरू हो जाता है |

 छठी अवस्था में चक्रवात का अंत (अवसान )  हो जाता है |

                     उष्णकटिबंधीय चक्रवात

 कर्क रेखा व मकर रेखा के मध्य उत्पन्न होने वाले चक्रवातो को  उष्णकटिबंधीय चक्रवात कहा जाता है | अक्षांशों के मौसम खासकर  वर्षा पर इन चक्रवातों का  पर्याप्त प्रभाव होता है | उष्णकटिबंधीय चक्रवातो  की ऊर्जा  का मुख्य स्रोत संघनन की गुप्त ऊष्मा होती है |

 इसकी आकृति सामान्यतः वृत्ताकार या अंडाकार होती है | लेकिन इसमें  समदाब रेखाओं की संख्या बहुत कम होती है   उष्णकटिबंधीय चक्रवातो  की गति 32 किमी प्रति घंटा से 120 किमी प्रति घंटा होती है | उष्णकटिबंधीय चक्रवातो की सदैव गतिशील नहीं होती  कभी-कभी एक ही स्थान पर कई दिनों तक वर्षा करती है | साधारणत:  ये व्यापारिक पवनों के साथ पूर्व से पश्चिम दिशा में अग्रसर होता है | सागरो  के ऊपर इन चक्रवातो  की गति तीव्र होती है | परंतु स्थल तक पहुंचने में क्रम में  यह कम होने लगती है यही कारण है | कि यह केवल तटीय क्षेत्रों को प्रभावित करती है |



सोमवार, 28 जून 2021

आर्द्रता किसे कहते हैं , निरपेक्ष आर्द्रता क्या है ,निरपेक्ष आर्द्रता क्या है ,सापेक्ष आर्द्रता क्या है , विशिष्ट आर्द्रता किया है

      आर्द्रता किसे कहते हैं







 वायुमंडल में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा को आर्द्रता कहते हैं वायुमंडल में जलवाष्प की मात्रा मात्र 2% है |   कभी-कभी यह 3% भी पहुंच जाती है | यह  बादल के रूप में सूर्य ताप को परावर्तित कर पृथ्वी के ताप को नियंत्रित करते हैं | वायुमंडल में उपस्थित आर्द्रता तथा उसमें निहित विभव ऊर्जा में सीधा संबंध होता है |

 वायुमंडल में आर्द्रता जितनी ही अधिक होती है | वायुमंडल में अस्थिरता तथा  झंझावात उत्पन्न करने  के लिए ऊर्जा उतना ही अधिक होती है | वायु में उपस्थिति जलवाष्प की मात्रा  वर्षा को निर्धारित करते हैं | जलवाष्प पार्थिव   विकिरण को अवशोषित कर पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित करते हैं | 

                        निरपेक्ष आर्द्रता

 किसी भी स्थान पर किसी भी तापमान पर  वायु में जितनी आर्द्रता उपस्थिति रहती है | उसे निरपेक्ष ही या वास्तविक आर्द्रता कहते हैं | इसकी गणना  घन मीटर  ग्राम  में  अथवा  घनफुट औंस में की जाती है |

                       सापेक्ष आर्द्रता

 किसी तापमान पर वायु में उपस्थित  जलवाष्प तथा वायु की जलवाष्प धारण करने  की क्षमता के  अनुपात को सापेक्ष आर्द्रता कहा जाता है | इसे प्रतिशत मात्रा में व्यक्त किया जाता है |

                       विशिष्ट आर्द्रता

 कूल  वायु  की मात्रा  ( जलवाष्प सहित ) तथा उसने उपस्थित जलवाष्प की मात्रा के अनुपात को विशिष्ट आर्द्रता कहा जाता है |  इसे आर्द्रता मिश्रण अनुपात भी कहा जाता है |  व्यवहारिक रूप से निरपेक्ष तथा विशिष्ट आर्द्रता दोनों ही समान होती है |

                             संघनन 

  वायु से ओसांक  बिंदु पर गैस  से तरल या ठोस अवस्था में परिवर्तन संघनन कहलाता है | ओसांक  बिंदु पर वायु  संतृप्त हो जाती है |

रविवार, 27 जून 2021

वायुदाब किसे कहते है वर्णन करे

           वायुदाब  क्या है 





 वायुमंडल में उपस्थित गैसों में एक निश्चित भार होता है | इस गैसों द्वारा पृथ्वी पर पड़ने वाली दबाव को  वायु दाब कहा जाता है | अर्थात प्रति इकाई क्षेत्रफल पर  गैसो द्वारा पड़ने वाले बल को वायु दाव  कहा जाता है |
 वायुदाब को बैरोमीटर में मापा जाता है  |  जलवायु वैज्ञानिकों ने इसके लिए मिली बार को इकाई माना है |  एक मिली बार 1 वर्ग सेमी पर गैस के 1 ग्राम भार का बल है | बैरोमीटर के पारा का पहले गिरना फिर धीरे-धीरे बढ़ना वर्षा की स्थिति का परिचायक है | बैरोमीटर में पारा का ऊपर की ओर बढ़ना प्रति चक्रवातिय  और साफ मौसम का संकेत देता है |  वायुदाब  के  वितरण को   समदाब रेखा द्वारा दर्शाया जाता है | समदाब रेखा वह कल्पित रेखा है | जो सम्मान वायुदाब वाले स्थानों को मिलाती है | वायुदाब को मौसम के पूर्वानुमान का एक महत्वपूर्ण सूचक माना जाता है |

                    वायुदाव पेटियाँ  


 धरातल पर वायुदाब की कुल सात  आदर्श पेटियां है  | उसमें से चार उच्च दाब की बेटियां और तीन न्यून  दाब की पेटियां है |
  

           विषुवत रेखीय निम्न वायुदाब पेटी

 विषुवत रेखा के नजदीक 5° उत्तर और दक्षिण के बीच भूमध्य रेखीय निम्न वायुदाब पेटी पाई जाती है | यहां वर्ष भर सूर्य की सीधी  किरणे पड़ती है | जिसके कारण तापमान हमेशा ऊंचा रहता है |जिसके फलस्वरूप यहां वायुदाब मिल पाई जाती है |   इस पेटी  मैं दोनों गोलार्ध  से चलने वाली व्यापारिक हवाओं का अभिसरण भी होता है |  तथा धरातल पर वायुदाब शांत अथवा हल्की तथा निश्चित दिशा से चलती है  | जिसके कारण इस पेटी को डोलड्रम्स कहा जाता है |   सूर्य के उत्तरायण अथवा दक्षिणायण होने के साथ साथ ही यह पेटी क्रमशः  उत्तर अथवा दक्षिण की ओर विस्थापित हो जाती है | 

              उप ध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी 

 उत्तरी तथा दक्षिणी गोलार्ध के 60° से 65° के मध्य विकसित वायुदाब पेटी को उप ध्रुवीय निम्न वायुदाब पेटी कहा जाता है | यहां  वर्ष भर तापमान कम होता है | इसके बावजूद भी यहां निम्न वायुदाब पेटी का निर्माण होता है | अतः हम कह  सकते हैं कि इस पेटी का संबंध तापमान से नहीं है  |
 वास्तव में पृथ्वी के घूर्णन गति के कारण इन अक्षांशों से वायु फ़ैल  कर स्थानांतरित हो जाती है  | जिसके कारण गति कम वायुदाब का आभास होता है |

                 उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटी 

 उत्तरी तथा दक्षिणी  गोलार्ध के 30° से 35°  अक्षांश के मध्य विकसित वायुदाब पेटी को  उच्च वायुदाब पेटी कहा जाता है |  इस  पेटी के क्षेत्र में शीत काल के दो माह को छोड़कर वर्ष भर ऊंचा तापमान रहता है | इसके बावजूद यहां उच्च वायुदाब पेटी का निर्माण होता है | जबकि नियमतः यहां निम्न  वायुदाब होना चाहिए |
 अतः इसका संबंध तापमान से ना होकर पृथ्वी की दैनिक गति तथा वायु के अवतलन से संबंधित है | भूमध्य रेखा से उठी  वायु तथा उप ध्रुवीय निम्न वायुदाब की  वायु इन  अक्षांशो  में नीचे उतर कर बैठती है | जिसके कारण वायुदाब अधिक हो जाता है | उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटी को अश्व अक्षांश भी कहा जाता है | 

                 ध्रुवीय  उच्च वायुदाब पेटी

 ध्रुव वृतो  से ध्रुवों की ओर जाने पर वायुदाब बढ़ता जाता है | ध्रुवों के निकट उच्च वायुदाब का एक विशेष क्षेत्र बन जाता है | जिस प्रकार विषुवत रेखा के निकट निम्न वायुदाब के कारण तापमान  की अधिकता है | उसी प्रकार ध्रुवों के समीप उच्च वायुदाब का कारण तापमान के न्यूनता  है |

शनिवार, 26 जून 2021

पवन किसे कहते हैं, पवन को प्रभावित करने वाले कारकों को लिखें, पवनों का वर्गीकरण करें

               पवन





 पृथ्वी की सतह पर जो  वायु चलती है उसे पवन कहा जाता है | वायुदाब के भिन्नता के कारण  पवन चलती है | वायुदाब में जितनी अधिक  विभिन्नता होगी  अथवा  समदाब रेखाएं जितनी अधिक निकट होगी पवन उतनी ही अधिक तेजी से चलेगी | 

        पवन को प्रभावित करने वाले कारक

    पवन को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित है

                  (1)  दाब प्रवणता बल

 वायुमंडलीय दाब के विभिन्नता के कारण एक बल उत्पन्न होता है | दूरी के संदर्भ में दाब परिवर्तन की दर को दाब प्रवणता कहा जाता है | जहां  समदाब रेखाएं पास पास होती है | वहां दाब प्रवणता अधिक है और जहां समदाब रेखाएं दूर-दूर होती है | वहां  दाब प्रवणता कम होती है |

                       (2)  घर्षण बल

 यह पवनों की गति को अधिक प्रभावित करता है | क्योंकि धरातल पर घर्षण बल सर्वाधिक होता है | इसका प्रभाव 1 से 3 किमी की ऊंचाई तक होता है | इसलिए धरातलीय सतह पर पवनो का वेग , घर्षण बल से प्रभावित होता है | जबकि समुद्री सतह में घर्षण बल कम होता है | जिसके कारण यहां पवनों का वेग  कम प्रभावित होता है |

 पृथ्वी के परिभ्रमण के कारण पवन कभी उच्च दाब क्षेत्र से निम्न दाब क्षेत्र की ओर सीधी नहीं जाती है | फेरल नियम (  इस नियम के अनुसार सभी वायु राशियों पृथ्वी की दैनिक गति के कारण उत्तरी गोलार्ध में दाई ओर मुड़ जाती हैं )  के अनुसार पवनों अपना मार्ग परिवर्तित कर लेती है |

 इस परिवर्तन का कारण कोरिऑलिस बल है | जो पृथ्वी के घूर्णन के कारण उत्पन्न अपकेंद्रीय शक्ति का  परिणाम है सर्वप्रथम 1844 ई. में फ्रांसीसी वैज्ञानिक कोरिऑलिस ने इसके विषय में विवरण प्रस्तुत किया इन्हें के नाम पर इस  बल को कोरिऑलिस बल कहा जाता है |

 इस प्रभाव से  पवन उत्तरी  गोलार्ध में अपनी मूल  दिशा में दाहिने ओर व दक्षिणी  गोलार्ध में अपने बाई ओर भी  विजयपथ विक्षेपित  हो जाती है | कोरिऑलिस बल  ध्रुवों पर सर्वाधिक और  विषुवत रेखा पर बहुत कम होता है | 

                       पवनों का वर्गीकरण

 पवनों की अवधि के अनुसार उसे दो वर्गों में बांटा जा सकता है

           (1)  स्थायी  पवन  (2) स्थानीय पवन  

                       (1)  स्थायी  पवन 

      स्थायी  पवन   तीन प्रकार के होते हैं

    (ii)  व्यापारिक पवन (ii)  पछुआ पवन (iii)  ध्रुवीय पवन

                         (i)  व्यापारिक पवन

 जब   विषुवतीय  वायुपेटी से वायु  ऊपर उठकर ध्रुवों की ओर चलती है |  लेकिन 30° डिग्री उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांश पर वायुदाब अधिक हो जाती है | जिसके कारण हवाएं नीचे उतरकर एकत्रित हो जाती है |पृथ्वी के अपने धुरी पर घूमने के कारण ध्रुवों की हवाएं भी 30°  दक्षिणी व उत्तरी अक्षांश पर एकत्र हो जाती है|

 यहां एकत्रित हुई हवाएं अधिक  दाब के कारण कम दाब की ओर चलती है | इस प्रकार जो पवन उपोष्ण उच्च दाब पेटियों से भूमध्य रेखा की ओर आती है | सन्मार्गी  पवन कहलाती है | सन्मार्गी  पवने  उत्तरी गोलार्ध में  उत्तरी - पूर्वी सन्मार्गी  पवनो  के नाम से विख्यात है |

 जब सूर्य कर्क रेखा पर सीधा चमकता है | तो ए पवन 40° उत्तरी अक्षांश से भूमध्य रेखा की ओर चलती है | दक्षिणी गोलार्ध में इसकी दिशाएं दक्षिण पूर्व होने के कारण के दक्षिणी पूर्वी सन्मार्गी  पवनो  के नाम से विख्यात है | 

                           (ii)  पछुआ पवन

 ये  उपोष्ण उच्च   वायुदाब से उप ध्रुवीय निम्न वायुदाब की ओर चलने वाली पवन है  | दक्षिणी गोलार्ध में समुद्र का विस्तार अधिक होने के कारण ये  पवन निरंतर निर्बाध गति से चलती रहती है |  और अधिक शक्तिशाली होती है | ये  पवन 40° दक्षिणी अक्षांश से 65° दक्षिणी अक्षांश कीमत क्षेत्रों में पूर्णता है | विकसित होती है दक्षिणी गोलार्ध में इस पवन का गति तीव्र होती है | जिसके कारण इसको गरजने वाला चालीसा, भयानक पचासा, तथा चीखता साठा कहते हैं यह काफी खतरनाक होती है | जिसके कारण नाविक इन पावनों से बहुत अधिक डरते हैं | क्योंकि कभी-कभी इस समुद्री जहाजों को डुबो देती है | 

                            (iii)  ध्रुवीय पवन

ये  पवन अधिक ठंडी होती है | ये  पवन  ध्रुवीय  उच्च वायुदाब से उप ध्रुवीय निम्न वायुदाब की ओर उत्तरी गोलार्ध में उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम  तथा  दक्षिणी  गोलार्ध में  दक्षिण पूर्व से दक्षिण पश्चिम चलती है | इन तीनों ग्रहीय पावनो के धरातलीय व उच्चतलीय  प्रवाह के  अंतर संबंधित प्रारूप के कारण दोनों गोलार्ध में तीन तरह की कोशिकाओं का निर्माण होता है | जिसे क्रमश:  हैडले , फेरेल , व  ध्रुवीय कोशिका कहते हैं |

                        (2) स्थानीय पवन  

 किसी स्थान विशेष में स्थानीय कारणों से उत्पन्न अनियमित हवाओ को स्थानीय पवन कहते है | हालाँकि सागर व स्थल समीर  एवं पर्वत व  घाटी समीर निर्मित स्थानीय पवने है | भूतल के गरम व  ठंडे होने से उत्पन्न  विभिन्नता  तथा दैनिक व वार्षिक चक्रों के विकास से  बहुत से स्थानीय  व क्षेत्रिय पवने प्रवाहित होती है | 

                     (i) मानसून पवने 

 ग्लोब की उन सभी भागों की हवा को जिसकी दिशा में ऋतु के अनुसार पूर्ण प्रत्यावर्तन की स्थिति आ जाती है मानसून कहलाता है | मानसून हवा की एकमात्र विशेषता दिशा परिवर्तन ही नहीं है | सामान्य रूप में मानसून हवाएं धरातल की संवहनीय  क्रम ही  है | जिसका आविर्भाव स्थल तथा  जल के विरोधी स्वभाव के कारण तथा तापीय विभिनता के कारण होता है | वैसे भाग जहां पर मानसून हवाओं का अधिकता  होता है | मानसूनी जलवायु प्रदेश कहलाता है | ग्लोब पर मानसूनी जलवायु का सर्वाधिक विकास दक्षिण पूर्वी एशिया तथा चीन एवं जापान पर हुआ है | इसके अलावा गिनी की खाड़ी वाला  पश्चिम अफ्रीका का भाग अयणवर्ती ,  पूर्वी अफ्रीका ,  अयणवर्ती  उत्तरी ऑस्ट्रेलिया , दक्षिण पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका , खासकर खाड़ी के समीप प्रान्त  आदि मानसूनी जलवायु के अंतर्गत आते हैं |

              (ii) स्थल व समुद्र समीर 

 ऊष्मा  के अवशोषण तथा स्थानांतरण के कारण स्थल व  समुद्र में विविधता पाई जाती है  | दिन के समय स्थल भाग समुद्र की अपेक्षा अधिक गर्म हो जाती है | अतः  स्थल पर हवाएँ   ऊपर उठती और निम्न दाब क्षेत्र बन जाती है | जबकि समुद्र अपेक्षाकृत अधिक ठंडे रहता है | और उस पर उच्च वायुदाब बना रहता है |  जिसके कारण समुद्र से स्थल की और दाब प्रवणता उत्पन्न होती है | और पवन समुद्र से स्थल की ओर समुद्री समीर के रूप में प्रवाहित होती है | रात के समय एकदम विपरीत प्रक्रिया होती है | स्थल समुद्री की अपेक्षा अधिक ठंडा होती है | जिसके कारण दाब प्रवणता स्थल से समुद्र की ओर होने पर स्थल समीर प्रवाहित होती है | 

              (iii)  पर्वत व  घाटी समीर

 दिन के समय पर्वतीय प्रदेशों में  ढाल अधिक गर्म हो जाती है | जिससे  ढाल पर निम्न दाब और घाटी में उच्च दाब बन जाता है | जिसके परिणामस्वरूप वायु  ढाल के साथ-साथ ऊपर उठते हैं | और इस खाली स्थान को भरने के लिए  वायु  घाटी की ओर से बहती  है |  इस पवन को घाटी समीर कहते हैं |

 इसी प्रकार रात के समय पर्वतीय ढाल अधिक ठंडी हो जाती है | जिसके कारण ढाल पर उच्च दाब और घाटी में  निम्न दाब बन जाता है | जिसके परिणाम स्वरूप सघन वायु  घाटी में नीचे उतरती है | जिसे पर्वतीय पवन कहते हैं  | उच्च  पठारों व  हिम  क्षेत्रों से घाटी में बहने वाली ठंडी वायु को और अवरोही  पवन कहते हैं |  पर्वत श्रेणियों के पवनविमुख ढालो पर एक अन्य प्रकार की उष्ण  पवन प्रवाहित होती है | जिसे आरोही पवन कहते हैं | जब ये  पवन पवनविमुख  ढालो पर नीचे उतरती है | तब ये शुष्क पवन रुद्धोष्म प्रक्रिया से गर्म हो जाती है | ये शुष्क  हवाएं कम समय में बर्फ को पिघला सकते हैं |


शुक्रवार, 25 जून 2021

वायुमंडलीय तापमान क्या है , वर्णन करे तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाले कारक को लिखे

          वायुमंडलीय तापमान  






 सूर्य वायुमंडलीय ऊर्जा और तापमान का मुख्य स्रोत है | लेकिन वायुमंडल की गर्म होने की प्रक्रिया बहुत ही जटिल है |

    वायुमंडल का तापमान निम्नलिखित बातों पर निर्भर करता है |

                 विकिरण  

 भौतिकी में प्रयुक्त विकिरण ऊर्जा का एक रूप है | जो स्थानांतरण ताप तरंगों द्वारा एक वस्तु से दूसरी वस्तु की ओर प्रवाहित होती है | विकिरण कहलाता है |
 गर्म तथा ठंडी वस्तुओं द्वारा लगातार उर्जा का विकिरण होते रहता है | ठंडी की अपेक्षा गर्म वस्तुओं में उर्जा का विकिरण दर अधिक होती है | इसी कारण पृथ्वी को प्राप्त होने वाला सूर्य  ताप लघु तरंगों के रूप में होता है | जबकि पृथ्वी द्वारा विकीरित  ताप  दीर्घा तरंगों में होता है |   हमारा वायुमंडल सूर्य से आने वाली लघु तरंगों के लिए पारदर्शी है | जबकि पृथ्वी द्वारा छोड़ी गई दीर्घ तरंगों के लिए अपारदर्शी हैं | अतः वायुमंडल सौर विकिरण की अपेक्षा पार्थिव विकिरण से अधिक ऊर्जा प्राप्त करता है  | 

                        सञ्चालन   

 जब एक कण से दूसरे कण में ऊर्जा का स्थानांतरण होता है तो उसे संचालन कहा जाता है | ऊर्जा का प्रवाह तब तक होते रहता है | जब तक कि दोनों वस्तुओं का तापमान बराबर ना हो जाए अथवा दोनों के बीच संपर्क टूट ना जाए |

                              संवहन    

 जब धरातल से प्राप्त उर्जा का स्थानांतरण एक स्थान से दूसरे स्थान पर ऊर्ध्वाधर  गति से होता है | तो इस प्रक्रिया को संवहन कहा जाता है |
 

   तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाले कारक 

        तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाले कारक  निम्नलिखित है   

                            अक्षांशीय स्थिति    

  अक्षांशीय स्थिति के कारण भी  सूर्यताप की मात्रा में  परिवर्तन होता है  | सूर्य की स्थिति पूरे वर्ष बदलती रहती है | उत्तरी गोलार्ध में शीत ऋतु में सूर्य दक्षिण में  स्थानापन्न होता है | जिससे यहां सूर्यताप कम प्राप्त होता है | तथा ग्रीष्म ऋतु में या उत्तर में होता है |

                             धरातल की प्रकृति  

 सूर्य ताप के संदर्भ में पृथ्वी का आचरण परिवर्तनशील है जबकि धरातल  पर आपेक्षिक ताप , चालकता ,  वाष्पीकरण पर निर्भर करता है | 

                            समुद्र से दूरी   

 ग्रीष्म ऋतु में एक ही अक्षांश पर स्थित महाद्वीप महासागर की अपेक्षा अधिक गर्म हो जाता है | तथा शीत ऋतु में अत्यधिक ठंड हो जाता है | भूखंड का आकार जीतना बड़ा होता है | या विषमता उतना ही अधिक होती जाती है | अतः महाद्वीपीयत्ता के कारण चरम तापमान तथा उच्च  ऋतुवार तापांतर मिलता है | दूसरी ओर महासागरों के पास स्थित क्षेत्रों में तापमान लगभग एक जैसा रहता है | तथा मौसमी तापांतर भी कम रहता है | समुद्र से दुरी बढ़ने पर ताप में अंतर रहता है | 

                  उच्चावच और ऊंचाई   

 हम समुद्र तल से जैसे-जैसे ऊपर उठते जाते हैं तापमान में धीरे-धीरे गिरावट होते जाता है | 165 मीटर की ऊंचाई बढ़ने पर 1° C तक तापमान में  कमी आती है |  यही कारण है कि  पर्वतीय प्रदेश मैदानी प्रदेशों की अपेक्षा अधिक ठंड होती है  | ऊंचाई के अनुसार तापमान में गिरावट आने की दर 6.5 डिग्री सेल्सियस प्रति किमी है |

                         समुद्री धराएँ   

 समुद्री धाराएं गर्म तथा ठंडी दो प्रकार की होती है | गर्म धाराएं जिन तटो के साथ होकर बहती है | वे उसको गर्म कर देता है | जबकि ठंडी धाराएं अपने निकटवर्ती तटो को और अधिक ठंडा कर देती है |

                       वनस्पति का आवरण  

 वनस्पति सूर्य से आने वाली सूर्यताप को बहुत अधिक मात्रा में अवशोषित कर लेता है | साथ ही साथ  वह तेजी से होने वाले पार्थिव विकिरण के रास्ते में भी बाधक होता है |  



गुरुवार, 24 जून 2021

वायुमंडल किसे कहते है , वायुमंडल के बारे में वर्णन करें ,आयन मंडल क्या है , सममण्डल क्या है ,विषममण्डल क्या है ,क्षोभमंडल क्या है,समतापमण्डल क्या है

             वायुमंडल





 वायुमंडल एक प्रकार का गैसीय  आवरण है जो पृथ्वी के चारों ओर व्याप्त है |  इसमें कई प्रकार के गैसों का मिश्रण है | जो पृथ्वी की आकर्षण शक्ति के कारण इसके चारों ओर टिका हुआ है | वायुमंडल की वजह से ही पृथ्वी पर जीवन संभव हो पाया है | इस प्रकार वायुमंडल संपूर्ण प्रकृति के अस्तित्व के साथ साथ है | मानव जीवन के अस्तित्व के लिए भी अनिवार्य तत्व है | वायुमंडल के कुल द्रव्यमान का 99% पृथ्वी की सतह से 32 किमी की ऊंचाई तक स्थित है | 

                   वायुमंडल का संघटन

 वायुमंडल गैसों जलवाष्प एवं धुलकणों से मिलकर बना है 

                               गैस

 वायुमंडल में कई प्रकार के गैसों का मिश्रण है |  गैसों का अनुपात निश्चित होता है |  परंतु ऊंचाई के साथ साथ  इन गैसों का अनुपात में अंतर भी दिखाई देता है | वायुमंडल के निचले स्तर में भारी गैस जैसे कार्बन डाइऑक्साइड,  ऑक्सीजन , नाइट्रोजन आदि तथा ऊपरी स्तर में हल्की गैस जैसे हिलियम ,  नियॉन ,  क्रिप्टन आदि पाई जाती है |  ऑक्सीजन की मात्रा 120 किमी की ऊंचाई पर नगन हो जाती है | इसी प्रकार कार्बन डाइऑक्साइड पृथ्वी की सतह से 90 किमी की ऊंचाई तक ही  पाई जाती है |

 कार्बन डाइऑक्साइड गैस सौर विकिरण के लिए प्रवेश्य है |  लेकिन पार्थिव विकिरण के लिए  अप्रवेश्य है | जिसके कारण यह ग्रीन हाउस प्रभाव के के लिए जिम्मेदार हैं | और वर्तमान समय में जीवाश्म ईंधन के दहन के कारण इसकी मात्रा बढ़ रही है  | ओजोन 10 से 50 किमी के बीच पाई जाती है | जो सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर  पृथ्वी पर आने से रोकती है  | 

                              जलवाष्प 

 जलवाष्प वायुमंडल का सर्वाधिक परिवर्तनशील तत्व है | जो धरातल के निकट इसकी मात्रा 1% से 4% तक पाई जाती है | पृथ्वी तल पर जलिए क्षेत्रों , मिट्टियो तथा वनस्पतियों के  वाष्पीकरण के द्वारा वायुमंडल में  जलवाष्प पहुंचती है | जलवाष्प की मात्रा तापमान तथा ऊंचाई से भी प्रभावित होती है | भूतल से 5 किमी की ऊंचाई तक वायुमंडल में समस्त जलवाष्प  का 90% भाग रहता है |  पृथ्वी तल से ऊपर जाने पर जलवाष्प की मात्रा घटती जाती है | जल वाष्प के कारण ही सभी प्रकार के संघनन तथा वर्षण ,  बादल ,  तुषार , हीम , ओस  आदि का सृजन होता है | 

                             धूलकण

 वायुमंडल में छोटे-छोटे ठोस कणों को रखने की क्षमता होती है | धूल कण प्राया वायुमंडल के निचले भाग में उपस्थित होता है | फिर भी  इसे संवहनीय वायु प्रवाह के द्वारा काफी ऊंचाई तक ले जा सकती है |

 धूल कणों का सबसे अधिक जमाव उपोष्ण और शीतोष्ण  प्रदेशो में शुष्क हवा के कारण   होता है | जो  विषुवत और ध्रुवीय प्रदेशों की तुलना में  अधिक मात्रा में होता है | 

               वायुमंडल का रासायनिक संघटन

 रासायनिक संघटन के दृष्टिकोण से वायुमंडल को दो भागों में बांटा गया है

   ( 1) सममण्डल 

   (2)  विषम मण्डल 

                        ( 1) सममण्डल

 वायुमंडल के इन परतों में उपस्थित गैसों के अनुपात में कोई भी परिवर्तन नहीं होता है | इसलिए इसे  सममण्डल कहा जाता है |

 सममंडल की रचना मुख्य रूप से ऑक्सीजन नाइट्रोजन आर्गन कार्बन डाइऑक्साइड आदि गैसों से हुई है | इसकी ऊंचाई समुद्र तल से 80 किमी की ऊंचाई तक पाई जाती है |

 तापमान के आधार पर इस मंडल को तीन  उपमंडलों में वर्गीकृत किया गया है  | 

   (1) क्षोभमंडल 

   (2)  समताप मंडल 

    (3)  मध्य मंडल  

                 (2)  विषम मण्डल 

 इस मंडल में गैसीय  संगठन में विषमता पाई जाती है | इसलिए इसे विषम मंडल कहा जाता है |

  सम मंडल से 80 किमी से ऊपर विषम मंडल का विस्तार है | इसमें आयन मंडल तथा ब्रह्मा मंडल को शामिल किया जाता है |

         विषम मंडल को 4 भागों में बांटा जा सकता है

 (1)  पहली परत में नाइट्रोजन गैस का विस्तार है जो 80 से 200 किमी के बीच फैली हुई है |

 (2)  नाइट्रोजन भारत के ऊपर परमाण्विक ऑक्सीजन परत पाई जाती है जो 200 से 1100 किमी के बीच के बीच फैली हुई है |

 ( 3)  तीसरी परत हीलियम परत है जो 1100 से 1700 किमी के बीच  फैली हुई है |

 (4)  ऊपरी परत हाइड्रोजन परत है जिसका विस्तार 1700 से  2600 किमी के बीच है |

                        वायुमंडल की संरचना

 वायुमंडल की संरचना को निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है  |    

                               क्षोभमंडल 

क्षोभमंडल वायुमंडल की सबसे निचली परत है | जो 8 से 18 किमी तक स्थित है   | क्षोभमंडल  की ऊंचाई विषुवत रेखा पर अधिक और योग्य भागों में कम पाई जाती है  | यह भिन्नता संवहन  के कारण होती है | क्षोभमंडल  की ऊंचाई में ऋतूवत  परिवर्तन होता है  | जाड़े की अपेक्षा गर्मी में इसकी सीमा ऊंची हो जाती है | वायुमंडल में उपस्थित गैसों का 95% क्षोभमंडल में पाया जाता है | धरातल में पाए जाने वाले जीवो का संबंध इसी मंडल से है | शीत ध्रुवो को छोड़कर   क्षोभमंडल    में ऊंचाई के साथ तापमान में कमी आती है  | ऊंचाई के साथ तापमान में प्रति 1 किमी में 6.5 डिग्री सेल्सियस की कमी आती है |

क्षोभमंडल में मौसमी घटनाओं का विशेष महत्व है | कोहरा बादल ओला तुषार आंधी तूफान मेघ गर्जन विद्युत प्रकाश सभी घटनाएं इसी मंडल में घटित होती है | 

                        समतापमंडल 

 समताप मंडल समुद्र तल से 50 किमी की ऊंचाई तक फैला हुआ है | धरातल से लगभग 30 किमी की ऊंचाई पर संक्रमण पेटी पाई जाती है | इस  पेटी  के ऊपर तापमान ऊंचाई के साथ तीव्र गति से ऊपर उठता है  | 

 ग्रीष्म ऋतु में समताप मंडल के तापमान में अक्षांशों के साथ वृद्धि ध्रुव तक बनी रहती है | लेकिन शीत ऋतु में 50°  से 60°  अक्षांश के बीच समताप मंडल सबसे अधिक गर्म रहता है 60° अक्षांश से ध्रुवों की ओर तापमान पुन: घट जाता है | इस मंडल की मोटाई ध्रुवों पर सबसे अधिक होती है | तथा कभी-कभी विषुवत रेखा पर  समताप मंडल बिल्कुल समाप्त हो जाता है | 

 सामान्यत: है यहां पर बादल नहीं पाए जाते हैं लेकिन कभी-कभी जलवाष्प की उपस्थिति के कारण दुर्लभ बादल जैसे मदर ऑफ पर्ल मेघ देखने को मिलती है | बादल  और जलवाष्प के अभाव एवं ऊर्ध्वाधर  पवनो की अनुपस्थिति के कारण यह पवन जेट विमानों की उड़ान हेतु उपयुक्त होती हैं | इस मंडल के निचले भाग अर्थात 20 किमी की ऊंचाई तक तापमान लगभग स्थिर रहता है | लेकिन ऊपरी भाग में 50 किमी की ऊंचाई तक तापमान क्रमश: बढ़ता है |  क्योंकि समताप मंडल में ओजोन परत पाई जाती है | और यह ओजोन परत सूर्य से पृथ्वी की ओर आने वाली हानिकारक पराबैंगनी  किरणों को सोख कर  पृथ्वी पर उपस्थित जीव की रक्षा करती है | समताप मंडल के ऊपर समताप सीमा पाई जाती है | जो समताप मंडल को मध्य मंडल से अलग करती है | 

                            मध्य मंडल

 मध्य मंडल का विस्तार   समताप सीमा से 50 किमी से 80 किमी की ऊंचाई तक पाया जाता है | मध्य मंडल में ऊंचाई के साथ तापमान में कमी आती है | यहां पास न्यूनतम तापमान -90  डिग्री सेल्सियस होती है | तथा कभी-कभी 80 किमी की ऊंचाई पर न्यूनतम तापमान -100 डिग्री सेल्सियस के आसपास पाया जाता है | मध्य मंडल की ऊपरी सीमा जिसके ऊपर जाने पर तापमान में वृद्धि होती है मध्य सीमा कहलाती है | मध्य मंडल में ऊंचाई के साथ-साथ वायुदाब में कमी आती है  | यहां 50 किमी की ऊंचाई पर एक मिलीबार वायुदाब तथा 90 किमी की ऊंचाई पर 0.01 मिलीबार दे पाया जाता है | 

              ताप मण्डल या उष्णमण्डल 

 मध्य सीमा के ऊपर  ( 80 किमी से ऊपर अनिश्चित ऊंचाई तक ) वाला वायुमंडलीय भाग  ताप मण्डल या उष्णमण्डल  कहलाता है | तापमंडल के निचले हिस्से में  ऑक्सीजन तथा नाइट्रोजन पाई जाती है  |  लेकिन 200 किमी की ऊंचाई पर आणविक  ऑक्सीजन की मात्रा आणविक नाइट्रोजन से अधिक हो जाती है | 

 ताप मंडल में ऊंचाई के साथ साथ तीव्र गति में तापमान में वृद्धि होती है |  तथा 350 किमी की   ऊंचाई   पर 1200° K  तापमान पाया जाता है |  इतना ऊंचा तापमान होने के कारण आणविक ऑक्सीजन द्वार 0.2 um  माइक्रोन से छोटे तरंगदैर्ध्य  वाली पराबैगनी किरणों का अवशोषण होता है | साथ ही आने वाली लघु तरंग किरणों को पुनः विकिरण करने में असक्षम होता है | इसकी ऊपरी सीमा तक तापमान बढ़कर 1700° K  हो जाता है | 

                          आयन मंडल

 आयन मंडल में व्याप्त  ऊंच विद्युत चालकता ही रेडियो तरंगों को पृथ्वी की ओर वापस परावर्तित करते हैं | इसका विस्तार 80 से 640 किलोमीटर की ऊंचाई तक है | यहां पर उपस्थित गैस के कारण विद्युत आवेशित होती है | आयन मंडल में उत्तरी ध्रुवीय ज्योति तथा दक्षिणी ध्रुवीय ज्योति देखने को मिलती है | ध्रुवीय ज्योति उच्च अक्षांशीय  तथा उप ध्रुवीय प्रदेशों की एक महत्वपूर्ण घटना है | इसकी उत्पत्ति सूर्य से आने वाली आवेशित कणों की पृथ्वी की ओर आने के कारण चुंबकीय क्षेत्र में 100 किमी ऊंचाई पर होती है |

     ध्रुवीय  ज्योति का सौर गतिविधियों के साथ  व्युत्क्रम  संबंध है | 

              ब्राह्ममण्डल  एवं चुंबकीय मंडल

ब्राह्ममण्डल  एवं चुंबकीय मंडल  का विस्तार अनंत है | और इसकी ऊपरी परत अंतरिक्ष में विलीन हो जाती है | तथा इसकी  वायु बहुत ही विरल है | यहां केवल सौर वायु द्वारा प्राप्त इलेक्ट्रॉन तथा प्रोटॉन के कण पाए जाते हैं | आवेशित कण 3000 से 16000 किमी के बीच  दो पट्टीयों में सकेंद्रित रहते हैं |  इसे वैैन  ऐलन  विकिरण पट्टी कहते हैं |



सोमवार, 21 जून 2021

ग्रहण क्या है , सूर्यग्रहण क्या है , चंद्र ग्रहण क्या है ,

        ग्रहण किसे कहते है 







 किसी खगोलीय पिंड का अंधकारमय  हो जाना ग्रहण कहलाता है | 

                ग्रहण दो प्रकार के होता है

               (1)   चंद्रग्रहण         

               ( 2 ) सूर्यग्रहण 

                          (1)   चंद्रग्रहण

 जब पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है  | तो उसे चंद्रग्रहण कहा जाता है |  चंद्र ग्रहण आंशिक या पूर्ण हो सकती है | जब चंद्रमा पूरी तरह से पृथ्वी की छाया से ढक जाती है | तो पूर्ण चंद्रग्रहण होता है | पूर्ण  चंद्रग्रहण एक घंटा 40 मिनट तक का होता है | यह स्थिति तब होती है | जब सूर्य और चंद्रमा के बीच पृथ्वी होती है | और तीनों एक ही रेखा में होती है | इस स्थिति को सिजगी  भी कहा जाता है | यह स्थिति केवल पूर्णिमा को ही बनती है | अत: चंद्रग्रहण पूर्णिमा के दिन ही होता है | जिन क्षेत्रों में पूर्ण चंद्रग्रहण दिखाई देता है | वहां की स्थिति को प्रच्छाया  कहते हैं |  और जिन क्षेत्रों में अर्ध  चंद्रग्रहण दिखाई देता है उन्हें उपछाया  कहते हैं |  

                       ( 2 ) सूर्यग्रहण 

 जब सूर्य और पृथ्वी के बीच चंद्रमा आ जाती है |  तो  पृथ्वी के जिन क्षेत्रों में चंद्रमा सूर्य को ढक लेती हैं | वहां सूर्य ग्रहण होता है | सूर्य ग्रहण आंशिक या पूर्ण हो सकती है |पूर्ण सूर्य ग्रहण में सूर्य का कोरोना भाग दिखाई  देता है  | सूर्य ग्रहण   वर्ष में न्यूनतम 2 तथा अधिकतम 5  हो सकती है  | सूर्य ग्रहण के दौरान अंधकारमय काल की अवधि   अधिकतम 7 मिनट 40 सेकंड तक हो सकती है |  औसतन यह अवधि 2.5 मिनट का होती है |  सूर्य ग्रहण को कभी भी नग्न  आंखों से नहीं देखना चाहिए क्योंकि  सूर्य ग्रहण के समय कोरोना विकिरण   से भी आँखे चले जाने का खतरा रहता है |

रविवार, 20 जून 2021

झील किसे कहते हैं , हिमानिकृत झील , नदीकृत झील , ज्वालामुखी द्वारा निर्मित झील के बारे में वर्णन करे

              झील



 भूतल पर स्थित  वे विस्तृत गड्ढे  जो जल के द्वारा भरा रहता है तथा स्थल के आंतरिक भाग में स्थित होता है झील कहलाता है |

 यह कभी-कभी नदीमार्ग के मध्य मे  उत्पन्न होती है |  कभी-कभी नदियों का उद्गम स्रोत होता है | तो कभी-कभी नदियों का मुहाना भी होता है |  लेकिन सभी झीलों का अपना-अपना प्रकृति होती है |  अर्थात  या तो वे मीठे पानी की झील होती है |  या खारे पानी की झील होती है | 

         उत्पत्ति के आधार पर  झीलों का वर्गीकरण

                        भ्रंश  झील 

 इस प्रकार की झील का निर्माण भ्रंश या  दरारों में जल भर जाने के कारण  निर्माण होता है |  

                       रिफ्ट धाटी  झील 

  रिफ्ट घाटी में जल भरने से जो झील का निर्माण होता है उसे रिफ्ट घाटी झील कहा जाता है |

                ज्वालामुखी द्वारा निर्मित झील

                          क्रेटर झील 

 क्रेटर  झील ज्वालामुखी के मुख से निर्मित झील है | 

                         लावा क्षेत्र झील 

 लावा के  असमतल बहाव के कारण रिक्त स्थानों में बनी झील | 

                     लावा बांध झील 

  नदियों के प्रवाह मार्ग में ज्वालामुखी लावा प्रवाह के कारण अवरुद्ध जलमार्ग द्वारा बनी झील लावा बांध झील कहलाता है | 

                     हिमानीकृत  झील

 हिमताल झील हिमानी अपरदन के कारण  निर्मित झील है | 

                     नदी कृत झील

                             गोखुर झील 

  नदी मार्ग के  विसर्पण  एवम पुनः नदी द्वारा लघु मार्ग प्राप्त करने के  पश्चात छोड़ दिए गए भूभाग में जल भरा रहता है जिससे गोखुर झील का निर्माण होता है | 

                          प्रपाती झील  

 जलप्रपात के गिरने के स्थान पर निर्मित  अवनमन  कुंड जब विस्तृत हो जाता है  तो प्रपाती झील का निर्माण होता है | 

                          डेल्टाई झील 

 नदियों द्वारा मुहाना क्षेत्र में अत्यधिक  मंद ढाल एवं  भार के कारण मार्ग के निरंतर परित्याग या बहूमार्ग द्वारा इसका निर्माण होता है | 


शनिवार, 19 जून 2021

पर्वत के बारे में वर्णन करें

   पर्वत  के बारे में वर्णन करें




 धरातल पर स्थित वैसे उच्चावच  जिसका  शीर्ष  आधार ताल की तुलना में संकुचित हो तथा ढाल तीव्र हो पर्वत कहलाता है | 

 पर्वत अपने आसपास के क्षेत्र से अधिक ऊंचा होता है | जिसके कारण वह दूर से स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है |

 पर्वतों की उत्पत्ति भू संचलन, ज्वालामुखी आदि क्रियाओं के द्वारा हुई है | 

              पर्वत विभिन्न स्वरूप के होते हैं

                            पर्वत श्रेणी 

  एक ही काल में निर्मित विभिन्न पर्वतों के निश्चित क्रम को पर्वत श्रेणी कहा जाता है | 

        जैसे  - हिमालय 

                       पर्वत श्रृंखला 

 विभिन्न  युगों में भिन्न  भिन्न प्रकार से निर्मित लंबे तथा  संकरे पर्वतों का विस्तार होता है  पर्वत श्रृंखला कहलाता है | 

 जैसे  - अपलेसियन

                             पर्वत तंत्र 

 एक ही युग में एक ही प्रकार से निर्मित होने वाले समूह शामिल होते हैं इस प्रकार के पर्वत को पर्वत तंत्र कहा जाता है | 

                            पर्वत समूह 

  इसमें विभिन्न काल में अलग-अलग प्रकार से निर्मित पर्वत श्रेणीया , तंत्र एवं श्रृंखलाएं पाई जाती है |   पर्वत समूह कहलाता है |

                             पर्वत कटक 

   इसमें लंबे एवं  संकरे आकार की  संकीर्ण एवं ऊंची पहाड़ियों के पर्वत खंड शामिल होते हैं |    

          उत्पत्ति के आधार पर पर्वतों का  वर्गीकरण   

 उत्पत्ति के आधार पर पर्वतों को दो भागों में बांटा गया है 

 (1)  नवीन  मोड़दार पर्वत 

 (2)  प्राचीन  मोड़दार पर्वत 

              (1)  नवीन  मोड़दार पर्वत    

     टर्शियरी  युग के समय  बने  मोड़दार पर्वतों को नवीन मोड़ दार पर्वत कहा जाता है  | संसार के लगभग सभी ऊंचे पर्वत वलित पर्वत के अंतर्गत ही आता है | 

   जैसे  -  रॉकी , हिमालय ,  आल्पस, एंडीज आदि   

               (2)  प्राचीन  मोड़दार पर्वत 

        टर्शियरी युग  के पूर्व अर्थात कैलिडोनियन एवं हर्शिनियन निर्माणकारी हलचलो के कारण  उत्पन्न पर्वत प्राचीन  मोड़दार  पर्वत कहलाता है | 

    इन पर्वतों पर अपरदन अनाच्छादन एवं उत्थान की क्रियाओं का स्पष्ट प्रभाव पड़ा है |  जिसके कारण  वे अपने  मूल रूप को खो चुके हैं | इसमें से कुछ पर्वत अवशिष्ट पर्वत के रूप में बदल गया है | 

 जैसे -  अरावली ,  विंध्याचल ,  युवराल , अपलेसियन आदि

               पर्वतों के सामान्य प्रकार 

                           वलित  पर्वत 

ये वलन क्रिया द्वारा निर्मित तथा  सबसे ऊंचे तथा सबसे विस्तृत पर्वत है |

 जैसे -  हिमालय ,रॉकी , एटलस, एंडीज आदि |

                  भ्रंश या  ब्लॉक पर्वत

 वैसे पर्वत जो धरातलीय भागों में भ्रंश उत्पन्न होने के कारण धरातल का कुछ भाग ऊपर उठ जाता है या नीचे धंस जाता है तो ऊंचे  उठे भाग को  भ्रंश या ब्लॉक पर्वत कहा जाता है | 

 जैसे -  सतपुड़ा ,  ब्लैक फॉरेस्ट , साल्ट रेंज |

                     अवशिष्ट पर्वत

 वैसे पर्वत जो अपरदन क्रिया के बाद अवशेष के रूप में बचे रहता है या  पूरी तरह अपरदित्त होकर लगभग समतल हो जाता है | इस प्रकार ऊंचे उठे भाग को अवशिष्ट पर्वत कहा जाता है | 

     जैसे -  अरावली पर्वत | 

                    गुंबदाकार पर्वत

 जब धरातलीय भाग  चाप के आकार  उभार होता है तो धरातलीय भाग ऊपर  उठ जाता है | जिसे गुंबदाकार पर्वत कहा जाता है |

 जैसे  - सिनसिनाती 

                       संगृहित पर्वत

 धरातल के ऊपर मिट्टी , मलवा , लावा इत्यादि के निरंतर जमा होते रहने के कारण  निर्मित पर्वतों को संगृहित पर्वत कहा जाता है | 

 जैसे -  रेनियर , हुड  शास्ता | 

पठार किसे कहते हैं , पठार के बारे में वर्णन करे

       पठार किसे कहते है 




 वैसे उच्च भूमि जिसका शिखर सपाट एवं विस्तृत होता है लेकिन किनारे काफी  तीव्र ढाल होती है पठार कहलाता है | 

 इसकी ऊंचाई कुछ भी हो सकती है लेकिन प्राय: 300 से 1000 मीटर  ऊंचे होते हैं | 

        पठारों  का वर्गीकरण करें 

 निर्माण की प्रक्रिया के अनुसार वर्गीकरण

 निर्माण की प्रक्रिया के अनुसार पठारों को दो भागों में बांटा जा सकता है  |  

  (1) अंतर्जात शक्तियों द्वारा उत्पन्न पठार 

  (2) वहिर्जात शक्तियों द्वारा उत्पन्न पठार 

   (1)  अंतर्जात शक्तियों द्वारा उत्पन्न पठार 

                   पटलविरुपणी  पठार 

 भू संचालन प्रक्रिया द्वारा भू पृष्ठ का कुछ भाग ऊपर उठकर जब पठारो का रूप धारण कर लेता है तो उसे पटलविरुपणी  पठार कहा जाता है | 

 जैसे तिब्बत का पठार , पेंटागोनिया  का पठार ,  दक्षिणी भारत का पठार , 

                          लावा का  पठार

 बेसाल्ट लावा के निक्षेपन द्वारा इसका निर्माण होता है इसका रंग काला होता है |

 जैसे -  ढक्कन का पठार ,  कोलंबिया का पठार |

       वहिर्जात शक्तियों द्वारा उत्पन्न पठार   

                           हिमानीकृत पठार

 विस्तृत हिमानी पर्वतीय भागों को  अपने अपरदन कार्य के द्वारा धिस कर सपाट पठार का   निर्माण   करती है |   हिमानीकृत पठार कहलाता है |

 जैसे - अण्टार्कटिका ,  ग्रीनलैंड ,  भारत का गढ़वाल का पठार, आदि

                         जल द्वारा निर्मित पठार

 नदियों के निक्षेप  द्वारा स्थल खंड ऊंचा होते रहता है | कभी-कभी निक्षेपित क्षेत्र  भू संचलन  प्रक्रिया द्वारा ऊपर उठकर पठार में बदल जाता है |

 जैसे चेरापूंजी , मैसूर , रांची , विंध्यान आदि का पठार | 

                     पवन द्वारा निर्मित पठार

 मिट्टी के छोटे-छोटे कण  पवनों के द्वारा निक्षेपित हो जाता है |  तथा लंबे समय तक निक्षेपित  होते रहने के कारण पठार का निर्माण होता है |

 जैसे - लोयस  पठार

  भौगोलिक स्थिति के आधार  पर पठारो  का वर्गीकरण

                       महाद्वीपीय पठार

 यह विस्तृत एवं अति प्राचीन पठार है | इसे शिल्ड भी कहा जाता है |

 जैसे  दक्षिण भारत का पठार , चीन ,  साइबेरिया ,|अरब ,  ब्राजील का पठार  आदि | 

                       अन्तरापर्वतीय पठार

  वैसे पठार चारों ओर से पर्वतों द्वारा  धिरा होता हैं अन्तरापर्वतीय पठार कहलाता है |

 जैसे - तिब्बत का पठार ,  बोलीविया का पठार, पेरू का पठार, ईरान का पठार आदि |

                        पर्वतपदीय पठार

 वैसे पठार जो एक और उच्च पर्वतों द्वारा तथा दूसरी ओर सागर या मैदान द्वारा गिरा होता है पर्वतपदीय पठार कहलाता है |

 जैसे दक्षिण अमेरिका में पैण्टागोनियाँ , उत्तरी अमेरिका का पीडमाण्ट पाठार  आदि | 

      जलवायु के अनुसार वर्गीकरण

  शुष्क पठार 

  आद्र पठार 

   हिमाच्छादित पठार

                आकृति के अनुसार वर्गीकरण 

गुम्बदाकार  पठार 

विच्छेदित पठार  

सपाट पठार 

सीढीनुमा पठार 

पुनर्युवनित पठार 



शुक्रवार, 18 जून 2021

भू -आकृति विज्ञान किसे कहते है , पृथ्वी की आंतरिक दशाएं , सियाल किसे कहते है , सिमा किसे कहते है , निफे किसे कहते है ,

       भू -आकृति विज्ञान  किसे कहते है 

 पृथ्वी की उत्पत्ति एवं संरचना के साथ-साथ उसके विविध स्थलाकृतिक  लक्ष्णो एवं उसके कारणों को समझाने के लिए भू आकृति विज्ञान का अध्ययन आवश्यक है | 

        पृथ्वी की आंतरिक दशाएं के बारे में चर्चा करें 

 पृथ्वी के आंतरिक भाग की वास्तविक स्थिति तथा उसकी बनावट के विषय में सही ज्ञान प्राप्त करना असंभव नहीं है | लेकिन कठिन कार्य जरूर है | क्योंकि पृथ्वी का आंतरिक भाग मानव के लिए दृश्य नहीं है | पृथ्वी पर सबसे आसानी से उपलब्ध ठोस पदार्थ धरातलीय अथवा वे चट्टाने है जो हम  खनन क्षेत्रों से प्राप्त करते हैं | दक्षिण अफ्रीका में सोने की खाने 3 से 4 किमी तक गहरी है | इससे अधिक गहराई में जा पाना असंभव है | क्योंकि इतनी गहराई पर तापमान बहुत अधिक होता है | आज तक सबसे गहरा प्रवेधन  आर्कटिक महासागर की कोला क्षेत्र में 12 किमी की गहराई तक ही किया गया है |

 पृथ्वी की आंतरिक संरचना की जानकारी देने वाले स्रोतों को दो वर्गों में बांटा जा सकता है | 

                ( 1 )  प्राकृतिक स्रोत 

                ( 2 )  अप्राकृतिक स्रोत  

                 ( 1 )  प्राकृतिक स्रोत   

 प्राकृतिक स्रोतों में गुरुत्वाकर्षण ज्वालामुखी और भूकंप संबंधी क्रियाएं शामिल है |

                        गुरुत्वाकर्षण बल 

   गुरुत्वाकर्षण बल पृथ्वी के धरातल पर विभिन्न अक्षांशों पर गुरुत्वाकर्षण बल एक समान नहीं होता है | या ध्रुवों पर अधिक एवं भूमध्य रेखा पर बहुत कम होता है | गुरुत्व का मान पदार्थ के द्रव्यमान के अनुसार भी बदलता है | पृथ्वी के भीतर पदार्थों का असमान वितरण भी इस सिद्धांत को प्रभावित करता है https://kindui3.blogspot.com/2021/06/blog-post_90.html   | 

                        ज्वालामुखी  

 ज्वालामुखी उद्गगार पृथ्वी की आंतरिक संरचना की  प्रत्यक्ष  जानकारी का एक अन्य  स्रोत है | जब कभी भी ज्वालामुखी उद्गार से लावा पृथ्वी के धरातल पर आता है | तो यह प्रयोगशाला अन्वेषण के लिए उपलब्ध होता है | 




                            भूकंपीय तरंगे 

  भूकंपीय तरंगे भी पृथ्वी की आंतरिक जानकारी का एक महत्वपूर्ण स्रोत  है  | 

                    ( 2 )  अप्राकृतिक स्रोत 

 अप्राकृतिक स्रोत में ताप दबाव व घनत्व शामिल है |

                                तापमान 

 तापमान सामान्यत:  भू पृष्ठ में भूगर्भ की ओर जाने पर प्रति 32 मीटर पर 1 डिग्री सेल्सियस की दर से तापमान में वृद्धि होती है लेकिन तापमान वृद्धि की यह दर एक सीमा तक ही सीमित  रहती है | 

                                 दबाव 

  पृथ्वी के आंतरिक भाग में किसी स्थान पर 1 वर्ग सेंटीमीटर क्षेत्रफल पर पड़ने वाला भार दबाव है 50 किमी की गहराई तक दबाव स्थल की अपेक्षा 13000 गुना अधिक होता है |

                               घनत्व 

 भूपटल का अधिकांश भाग महाद्वीपों का बना है | जिसकी रचना अवसादी चट्टानों से हुई है | इसका औसत घनत्व 2.7 है | जबकि न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत के अनुसार संपूर्ण पृथ्वी का घनत्व 5.5 है | अर्थात पृथ्वी के आंतरिक भागों का घनत्व अधिक है |

                     पृथ्वी का आंतरिक संगठन

                                   क्रस्ट 

     क्रस्ट  पृथ्वी का सबसे बाहरी भाग है | महासागरों में भूपर्पटी की मोटाई महाद्वीपों की तुलना में कम है | महासागरों में इसकी औसत मोटाई 5 किमी है | वही महाद्वीपों में औसत मोटाई 30 किमी है | महाद्वीपीय भूपर्पटी भारी चट्टानों से बनी है | और इसका घनत्व 3 ग्राम प्रति घन सेमी है | महासागरों के नीचे भूपर्पटी कि चट्टाने बेसाल्ट निर्मित है | इसका घनत्व 2.7 ग्राम प्रति घन सेमी है |

                                मेंटल

 भूगर्भ में पपर्टी  के नीचे का भाग मेंटल कहलाता है | यह मोहो असांतत्य से  आरंभ होकर 2900 किमी की गहराई तक पाया जाता है  | मेंटल का ऊपरी भाग दुर्बलता मंडल कहा जाता है | जिसका विस्तार 400 किमी तक आंका गया है | ज्वालामुखी उद्गार के दौरान जो लावा धरातल पर पहुंचता है | उसका मुख्य स्रोत यही दुर्बलता मंडल है | मेंटल का घनत्व  भूपर्पटी की चट्टानों से अधिक है | पृथ्वी के आयतन का 83% तथा द्रव्यमान का 67% भाग   इसमें व्याप्त है |

                                   क्रोड

 क्रोड व मेंटल की सीमा 2900 किमी की गहराई पर है | बाह्रा क्रोड   आंशिक  तरल अवस्था में है | जबकि आंतरिक क्रोड  ठोस अवस्था में है | बाह्रा क्रोड  तरल अवस्था में इसलिए है क्योंकि यहां दाब की तुलना में तापमान अधिक होता है |  जबकि नीचे बढ़ने पर तापमान की अपेक्षा दाब अधिक हो जाता है | इसलिए आंतरिक क्रोड ठोस अवस्था में है | 

                    पृथ्वी का रासायनिक संगठन 

 प्रख्यात भूगर्भ शास्त्री एडवर्ड स्वेेश ने  सर्वप्रथम पृथ्वी का रासायनिक संगठन के बारे में अपना मत प्रकट किया  | इनके अनुसार भूपटल का ऊपरी भाग  अवसादी शैलो का बना हुआ है | अवसादी शैलो  की गहराई तथा घनत्व बहुत ही कम है | इसके ऊपरी भाग में हल्के सिलिकेट तथा निचले भाग में भारी सिलिकेट  के पदार्थ है | 

            इसके नीचे स्वेस  ने तीन परते मानी है | 

                             ( 1 )  सियाल  

 अवसादी शैलो के नीचे सियाल की परत पाई जाती है  | जिसका निर्माण सिलिका एवं एलुमिनियम से हुई है| इस परत की औसत गहराई 50 से 300 किमी तक है | तथा इसका घनत्व 2.75 से 2.90 तक है | यह परत ग्रेनाइट शैलो की है |  जिसमें अम्लीय  अंशो की प्रधानता है  | सियाल में पोटैशियम सोडियम एवं एलुमिनियम के सिलिकेट अधिक है | महाद्वीपों का निर्माण सियाल से ही हुआ है | यह अपने से नीचे वाली परत से हल्के होने के कारण उस पर तैर रहा है | इस परत को लिथोस्फीयर भी कहा जाता है | 

                               ( 2 )  सिमा  

 यह  सियाल के नीचे अवस्थित है | और इसमें  सिलिका एवं मैग्नीशियम की प्रधानता होती है  | इस परत का घनत्व 2.90 से    4.75 है | इसकी गहराई 1000 से 2000 किमी तक है | इस परत में क्षारीय  अंश की प्रधानता है  |  यहां मैग्निशियम कैलशियम एवं लोहे के सिलिकेट मिलते  हैं  | सामान्यता इस भाग को पायरोस्फीयर भी कहा जाता है  |

                                  ( 3 )  निफे   

 यह सिमा के निचे तीसरी  एवं अंतिम परत है | इस परत में   निकिल एवं लोहा की प्रधानता होती है | यह परत पृथ्वी के केंद्र तक विस्तृत है | एवं इसका घनत्व 11 से 13 है  पृथ्वी के आंतरिक कोर में लोहे की उपस्थिति पृथ्वी की चुंबकीय शक्ति को प्रमाणित करती है |

 इसे  बैरीस्फीयर भी कहा जाता है | 

 

 

गुरुवार, 17 जून 2021

ग्लोब के बारे में वर्णन करें, अक्षांश रेखा क्या है , विषुवत रेखा किसे कहते है , अंतरराष्ट्रीय तिथि रेखा के बारे में बताएं , देशांतर रेखा किसे कहते है

      ग्लोब किसे कहते है ग्लोब के बारे में बताएं 



 हमारी पृथ्वी गोलाकार है | जो सूर्य की परिक्रमा अपने दीर्घ वृत्ताकार पथ पर करती  हैं  | ग्लोब  पृथ्वी का यथार्थ निरूपण है | यद्यपि ग्लोब पर धरातल की आकृतियों एवं दिशाओं का प्रदर्शन  शुद्धता पूर्वक किया जा सकता है | तथापि ग्लोब के प्रयोग में कई असुविधाएं आती है |  ग्लोब पर सभी स्थान अक्षांश एवं देशांतर रेखाओं  ( जो काल्पनिक रेखाएं हैं ) की सहायता से दर्शाए जाती है   

        अक्षांश रेखा किसे कहते है 

 किसी स्थान की भूमध्य रेखा से उत्तर तथा दक्षिण की ओर गुणात्मक दूरी को उस स्थान का अक्षांश कहा जाता है |  तथा एक ही गुणात्मक दूरी वाले स्थान को मिलाने वाली रेखा को अक्षांश रेखा कहा जाता है |

  भूमध्य रेखा से ध्रुवों तक 90° अक्षांश होते हैं  भूमध्य रेखा से हम  जैसे-जैसे  ध्रुवों की ओर बढ़ते जाते हैं अक्षांश रेखा का मान बढ़ता जाता है | यदि हम भूमध्य रेखा से उत्तर की ओर जाते हैं तो उस स्थान का अक्षांशीय मान (°N) लिखते हैं   और दक्षिण जाने पर  (°S) लिखते हैं | सभी अक्षांश रेखाएं समांतर होती है दो अक्षांशों के मध्य की दूरी लगभग 111 किमी होता है |

      विषुवत रेखा किसे कहते है 

 उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों को मिलाने वाली काल्पनिक रेखाओ को  देशांतर रेखा कहा जाता है | यह रेखाएं समांतर नहीं होती है,  क्योंकि ध्रुवों से विषुवत रेखा की ओर बढ़ने पर देशांतरो के बीच की दूरी बढ़ती जाती है |  विषुवत रेखा पर इसके बीच की दूरी 111.32 किमी होती है |

 ब्रिटेन के ग्रीनविच ( जहां प्राचीन वेधशाला अवस्थित है ) से गुजरने वाली रेखा को प्रधान मध्यान रेखा कहा जाता है | एवं इसके दोनों ओर 180° अंशो  में देशांतर रेखाएं विभाजित है | चुकी 1° देशांतर रेखा को पार करने में 4 मिनट का समय लगता है  | अतः प्रधान मध्यान रेखा 0° से 90° पूर्व या पश्चिम पर जाने में 6 घंटे का समय लगता है |

 भारत में माध्य प्रामाणिक समय रेखा 82.5°  पूर्व मिर्जापुर ( उत्तर प्रदेश ) से होकर गुजरती है | जो ग्रीनविच के  मध्याह्न से 5 घंटे 30 मिनट आगे है |

 समय की सुविधा एवं देश में एकरूपता बनाए रखने के लिए अधिकांश देशों में एक ही  माध्य प्रमाणिक समय  निर्धारित किया गया है   | जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में 7 एवं सर्वाधिक 9 टाइम जोन रूस में है  | ऑस्ट्रेलिया में तीन टाइम जोन है जबकि भारत एवं चीन में एक  टाइम जोन निर्धारित किया गया है | क्रोनोमीटर यंत्र की सहायता से ग्रीनविच समय के साथ-साथ किसी भी स्थान का देशांतर ज्ञात किया जाता है |

      महत्वपूर्ण अक्षांश एवं देशांतर रेखाओं पर स्थित देश

                  विषुवत रेखा ( पश्चिम से पूर्व ) 

  इक्वाडोर ,  कोलंबिया ,  ब्राजील  , साओटोमे प्रिंस्पी , गैबोन , कांगो गणराज्य , जनतांत्रिक कांगो गणराज्य , युगांडा , केन्या , सोमालिया , मालदीव , इंडोनेशिया , किरीबाती 

                कर्क रेखा  ( पश्चिम से पूर्व  ) 

  चिली  , अर्जेंटीना , पराग्वे , ब्राजील , नामीबिया , बोत्सवाना  , दक्षिण अफ्रीका , मोजाम्बिक , मेडागास्कर , तथा आस्ट्रेलिया ,

0° देशांतर ( उतर से दक्षिण  ) -  यूनाइटेड किंगडम फ्रांस स्पेन , अल्जीरिया , माली , बुर्किना फासो , टोगो  घाना 

                 वृहत वृत्त और न्यून वृत्त 

                              वृहत वृत्त  

 बृहत वृत  वे  वृत होते हैं  | जिसके तल पृथ्वी के बीचों बीच से गुजरते हुए पृथ्वी को दो सामान भागों में विभक्त करती है | वृहत वृत्त  कहलाती है |

                             न्यून वृत्त  

वे वृत्त जो पृथ्वी के बीच से नहीं गुजरती है |  और ना ही पृथ्वी को दोस्त समान भागों में बांटती है , न्यून वृत्त  कहलाती है  |

 भूमध्य रेखा एवं सभी देशांतर रेखाएं  वृहत वृत्त होती है |   नाविक वृहत वृत्त का अनुसरण करता है | क्योंकि यह पृथ्वी पर किन्ही दो स्थानों के बीच की न्यूनतम दूरी को दर्शाती है | धरातल पर अनेक वृहत  वृत्त खींचे जा सकते हैं |

       अंतरराष्ट्रीय तिथि रेखा क्या है? अंतरराष्ट्रीय  तिथि रेखा के बारे में बताएं 

1884 ई.  मैं वाशिंगटन में  हुई संधि के बाद 180°  याम्योत्तर के लगभग (  स्थलखंडों को छोड़कर )  एक काल्पनिक रेखा निर्धारित की गई जिसे अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा कहा जाता है | अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा  आर्कटिक सागर ,  चुक्सी  सागर ,  बेरिंग जल संधि व प्रशांत महासागर से गुजरती है बेरिंग जल संधि अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा के समांतर स्थित है | इस रेखा के पूर्व से पश्चिम की ओर यात्रा करने पर या पार करने पर एक दिन घट जाएगा जबकि पश्चिम से पूर्व की ओर यात्रा करने पर 1 दिन बढ़ जाएगा अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा सीधी रेखा ना होकर टेढ़ी-मेढ़ी रेखा है | ताकि यह किसी स्थलखंड से होकर ना गुजरे यह रेखा चार बार विचलित होती है | वर्ष 2011 में समुआ द्वीप   को अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा के पश्चिम में कर दिया गया है |  इसी तरह टोकेलाउ भी अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा के पश्चिम में आ गया है| इस परिवर्तन का मुख्य कारण इन द्वीप  की आस्ट्रेलिया व न्यूजीलैंड से भौगोलिक समीपता  एवं व्यापार की अधिकता है |

 विषुवत रेखा सबसे बड़ी अक्षांश रेखा होती है | जिसकी लंबाई लगभग 40069   किमी होती है | विषुवत रेखा से ध्रुवों की ओर जैसे-जैसे बढ़ते हैं | वस्तु के  भार में बढ़ोतरी होती जाती है | वस्तु के भार में यह बढ़ोतरी घूर्णन  बल के  कमी के कारण होती है  | उत्तरी गोलार्ध में   विषुवत रेखा से  23.5°  अंश पर खींचा गया काल्पनिक वृत्त   कर्क रेखा है | दक्षिणी गोलार्ध में  विषुवत रेखा से 23.5 अंश पर   खींचा गया काल्पनिक वृत्त  मकर रेखा है | 66.5° N अक्षांश रेखा  को आर्कटिक  वृत्त एवं 66.5° S को अंटार्कटिक वृत्त कहा जाता है|   इसे उप  ध्रुवीय यह ब्रिज भी कहा जाता है |  इसी काल्पनिक रेखा पर पृथ्वी का अक्ष  बिंदु स्थित है | 

          देशांतर रेखा किसे कहते है 

 उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुवों को मिलाने वाली काल्पनिक रेखाओं को देशांतर रेखाएं कहा जाता है | देशांतर रेखाएं समानांतर नहीं होती है , क्योंकि ध्रुव से विषुवत रेखा की ओर बढ़ने पर देशांतर के बीच की दूरी बढ़ती जाती है | विषुवत रेखा पर इनके बीच की दूरी अधिकतम 111.32 किमी होता है | ब्रिटेन के ग्रीनविच ( जहां प्राचीन वेदशाला अवस्थित है ) से गुजरने वाले रेखा को प्रधान मध्यान रेखा कहा जाता है |  एवं इसके दोनों तरफ 180° अंशो  की देशांतर रेखाएं विभाजित है | चूँकि 1°  देशांतर रेखा को पार करने में 4 मिनट का समय लगता है | आत: प्रधान मध्यान रेखा 0°  से 90° डिग्री पूर्व या पश्चिम पर जाने पर 6 घंटे का समय लगता है |  भारत में मध्य प्रमाणिक समय रेखा 82.5 पूर्व मिर्जापुर  ( उत्तर प्रदेश  ) से होकर गुजरती है |  जो ग्रीनविच मध्यान से 5 घंटे 30 मिनट आगे है | 
     समय की सुविधा एवं देश में एकरूपता बनाए रखने के लिए विश्व के  अधिकांश देशों में एक ही माध्य प्रमाणिक समय निर्धारित किया गया है | जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में 7 एवं सर्वाधिक 9 टाइम जोन रूस में है | वहीं आस्ट्रेलिया में तीन टाइम जोन है | भारत एवं चीन में एक टाइम जोन  निर्धारित है | क्रोनोमीटर यंत्र की सहायता से ग्रीनविच समय के साथ साथ किसी भी स्थान का देशांतर ज्ञात किया जाता है |

पृथ्वी की उत्पत्ति कैसे हुई , पृथ्वी के बारे में वर्णन करें , पृथ्वी का परिक्रमण तथा ऋतुएँ , पृथ्वी का महत्वपूर्ण तथ्य

        पृथ्वी क्या है?  पृथ्वी के बारे में वर्णन करें 




 पृथ्वी सौरमंडल में विद्यमान सभी ग्रहों में सबसे महत्वपूर्ण है | क्योंकि केवल पृथ्वी पर ही जीवन संभव है | इसके अलावा यहां स्थल एवं जल का वितरण तथा क्रमिक ऋतु परिवर्तन के कारण पृथ्वी को एक विशिष्ट ग्रह बनाने में मदद करता है | इसकी घूर्णन तथा परिक्रमण गति समस्त  जीवन का मूल आधार है |

         पृथ्वी की उत्पत्ति कैसे हुई 

 पृथ्वी की उत्पत्ति के संबंध में सर्वप्रथम तर्कपूर्ण परिकल्पना का प्रतिपादन फ्रांसीसी वैज्ञानिक कास्ते  द बफन  ने 1749 ई. मे किया था |  इसके उत्पत्ति के संबंध में वैज्ञानिकों ने 2 वर्गों में बांट कर जानकारी दी है |

                 ( 1 ) अद्वैतवादी  संकल्पना

                 ( 2 )  द्वैतवादी संकल्पना

                  ( 1 ) अद्वैतवादी  संकल्पना  

 अद्वैतवादी संकल्पना के अनुसार ग्रहों तथा पृथ्वी की उत्पत्ति केवल एक ही वस्तु ( तारा ) से बनी हुई मानी जाती है |

                    ( 2 )  द्वैतवादी संकल्पना   

  द्वैतवादी संकल्पना  के अनुसार ग्रहों तथा पृथ्वी की उत्पत्ति एक से अधिक खास कर दो तारों के सहयोग से हुई है | 

     अतः पृथ्वी की उत्पत्ति के संबंध में कोई एकमत नहीं है | फिर भी ऐसा माना जाता है ,  कि प्रारंभ  में  पृथ्वी चट्टानी गर्म एवं  विरान  ग्रह थी |  इसका वायुमंडल भी विरल था | जो हाइड्रोजन एवं हीलियम से बना था | और आज के वायु मंडल से बिल्कुल भिन्न था |  अतः ऐसा माना जाता है कि यहां अनेक ऐसी घटनाएं एवं क्रियाएं हुए जिसके कारण यह  एक सुंदर ग्रह में परिवर्तित हो  गया |  ऐसा माना जा रहा है कि पृथ्वी पर जीवन का विकास 460 करोड़ वर्ष पूर्व हुआ |

                      पृथ्वी की गतियां 

 पृथ्वी सूर्य से दूरी के अनुसार तीसरा तथा आकार में पांचवा बड़ा ग्रह है |  यह अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व की ओर 1610 किमी प्रति घंटा की चाल से घूमती है पृथ्वी 23 घंटे 56 मिनट 4 सेकंड में एक पूरा चक्कर लगाती है |

पृथ्वी की गति दो प्रकार की होती है |

             (1)  घूर्णन गति 

           ( 2 )  परिक्रमण गति

             (1)  घूर्णन गति  

 पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है | जिसे घूर्णन गति कहा जाता है |

          ( 2 )  परिक्रमण गति  

  पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एक स्थिर कक्षा में गति करती है जिसे परिक्रमण गति कहा जाता है | 

     पृथ्वी की इन दोनों गतियों  के कारण ही हैं  | दिन-रात एवं ऋतु परिवर्तन होता है | पृथ्वी का अपने अक्ष पर झुकाव भी ऋतु परिवर्तन का एक प्रमुख कारण माना जाता है | पृथ्वी के अपने अक्षों  पर परिक्रमण गति के कारण अलग-अलग ऋतुओं  में दिन व रात  की अवधि में अंतर  होती है | 

 पृथ्वी को सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में 365 दिन 5 घंटे 48 मिनट 46 सेकंड का समय लगता है |

 पृथ्वी को सूर्य की एक परिक्रमा करने में जो समय लगता है |उसे सौर वर्ष कहा जाता है | प्रत्येक सौर  वर्ष कैलेंडर वर्ष से लगभग 6 घंटा बढ़ जाता है  | जिसे हर चौथे वर्ष में लीप वर्ष बनाकर समायोजित किया जाता है  | जिसके कारण लीप वर्ष 366 दिन का हो जाता है |  और उस लीप वर्ष में फरवरी माह 28 दिन के स्थान पर 29 दिन होता है |

              पृथ्वी का परिक्रमण तथा ऋतुएँ 

 21 जून को उत्तरी ध्रुव और 22 दिसंबर को दक्षिणी ध्रुव सूर्य की ओर झुका होता है | 21 मार्च और 23 सितंबर को कोई भी ध्रुव सूर्य की ओर झुका नहीं होता है | 21 जून वाली स्थिति को ग्रीष्म अयनांत  कहा जाता है | तथा 22 दिसंबर वाली स्थिति को शीत अयनांत  कहा जाता है  | अर्थात मकर संक्रांति कहा जाता है क्योंकि इस तिथि के बाद सूर्य उत्तर की ओर यात्रा प्रारंभ कर देता है जिसे उत्तरायण भी कहा जाता है | जो  छह  मास का होता है | 

 जब 21 मार्च और 23 सितंबर को कोई भी ध्रुव सूर्य की ओर झुका नहीं होता है | तो दोनों गोलार्ध में दिन रात 12 घंटे के होते हैं | अर्थात दिन व रात बराबर होता है जिसे विषुव कहा जाता है | 21 मार्च को वसंत  विषुवत कहा जाता है | तथा 23 सितंबर को शरद विषुव कहा जाता है |

 3 जनवरी को सूर्य पृथ्वी के काफी नजदीक रहता है जिसके कारण 3 जनवरी को उपसौर कहा जाता है | जबकि 4 जुलाई को सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी सर्वाधिक होती है | जिसके कारण 4 जुलाई की स्थिति को अपसौर कहा जाता है |

            पृथ्वी का कुछ  महत्वपूर्ण तथ्य

  पृथ्वी का संपूर्ण  धरातलीय क्षेत्रफल 510066100  किमी

 पृथ्वी के स्थल का क्षेत्रफल 14.89 करोड़  किमी

 पृथ्वी का आयतन 1.08321×10^12 किमी 

 पृथ्वी की सतह का औसत तापमान 15 डिग्री सेल्सियस

 पृथ्वी का औसत घनत्व 5.53 ग्राम/ सेमी 

 पृथ्वी का विषुवतीय परिधि 40076 किमी 

 पृथ्वी का ध्रुवीय परिधि 40008 किमी 

 पृथ्वी के अक्ष  का कक्षा तल पर झुकाव 23.5° 

 पृथ्वी के अक्ष  का कक्षा तल पर कोण 66.5°

 पृथ्वी की घूर्णन  अवधि 23 घंटे 56 मिनट 4 सेकंड

 पृथ्वी की परिक्रमण अवधि 365 दिन 6 घंटे


  

विश्व का भूगोल , ब्रह्मांड की उत्पत्ति से संबंधित सिद्धांत को लिखें ,आकाशगंगा किसे कहते है , डॉप्लर विस्थापन क्या है ,तारे का जीवन चक्र क्या है

         विश्व का भूगोल 

     ब्राह्मण्ड  क्या है ब्रह्मण्ड के बारे में वर्णन करें 







 आकाशगंगा के सभी   पूंजो को सम्मिलित रूप  को ब्राह्मण्ड  कहा जाता है |

       ब्रह्मांड की उत्पत्ति से संबंधित सिद्धांत क्या है 

  ब्राह्मण्ड की उत्पत्ति के संबंध में बिग बैंग सिद्धांत  सबसे अधिक विश्वासनीय सिद्धांत माना  जाता है | जिसका प्रतिपादन जॉर्ज लेमैत्रे ने किया था  इसके अनुसार लगभग 13.7 अरब वर्ष पूर्व जब ब्रमांड के समस्त तत्व एक  ही स्थान पर अत्यधिक संघनित रूप में था तब उसमे किसी  कारण से विस्फोट हुआ जिस से निकलने वाले पदार्थ अत्यधिक तीव्र गति से प्रसारित हुए  और ब्राह्मण्ड का वर्तमान स्वरूप प्राप्त हुआ  | इसके पश्चात भी ब्राह्मण्ड का निरंतर विस्तार जारी है | जिसका प्रमाण  आकाशगंगा के बीच बढ़ती हुई दूरी है |

     कॉस्मिक थ्रेड  नामक सिद्धांत के अनुसार ब्रह्मांड धागे जैसी संरचनाओ से आपस में जुड़ा हुआ है |  इस सिद्धांत के लिए भारतीय वैज्ञानिक प्रोफेसर अशोक सेन को प्रथम यूरी मिलंतर अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया |

 ब्रह्मांड के रहस्य को जानने के लिए  वर्ष 2010 में यूरोपीयन सेंटर फॉर न्यूक्लियर रिसर्च ने जिनेवा में पृथ्वी की सतह से 100 फीट नीचे 27 किलोमीटर लंबी सुरंग में लार्ज हैड्रन कोलाइडर नामक महाप्रयोग किया गया जिसे विज्ञान की दुनिया में बिग  बैंग के नाम से जाना जाता है इसमें गॉड पाटीकल की अहम भूमिका है |

 गॉड पार्टिकल परमाणु से भी छोटा अति सूक्ष्म कण है  जिसे ब्रह्मांड के निर्माण का मूल कारण माना गया है | इस कण की परिकल्पना सर्वप्रथम वर्ष  1964 में पीटर हिग्स  के द्वारा की गई थी  | चूँकि भारतीय वैज्ञानिक सत्येंद्र नाथ बोस ने भी  इससे संबंधित विचार दिया था  | इसलिए इसे हिग्स बोसॉन भी कहा जाता है |

        आकाशगंगा  किसे कहते है 

  ब्राह्मण्ड में तारों के समूह को आकाशगंगा कहा जाता है इसमें तारों का विशाल समूह होता है | जिसमें हजारों करोड़ तारे हैं ब्रह्मांड में आकाशगंगा की संख्या करीब 10000 मिलियन मानी जाती है | और हर आकाशगंगा में अनुमानतः एक लाख मिलियन तारे हैं  | इसी अनगिनत आकाशगंगा में एक भाग मंदाकिनी जो रात में दिखाई देने वाला तारों का समूह है | इसी का हिस्सा हमारा सौरमंडल है मंदाकिनी का आकार  सर्पी्ला है | और सौरमंडल इसके बाह्रा भाग में अवस्थित है |

        डॉप्लर विस्थापन  क्या है 

 डॉप्लर विस्थापन आकाशगंगाओ से आने वाली प्रकाश स्पेक्ट्रम के आधार पर विश्व के विस्तार के बारे में बताया गया है | यदि स्पेक्ट्रम में रक्त विस्थापन की घटना हो तो  प्रेक्षित  आकाशगंगा पृथ्वी से दूर भाग रही है | और यदि स्पेक्ट्रम में बैगनी विस्थापन हो तो प्रेक्षित  आकाशगंगा पृथ्वी के पास आ रही है चूकि अभी तक देखा गया है | कि स्पेक्ट्रम में रक्त विस्थापन की घटना के ही प्रमाण मिले हैं  आत: है यह माना जाता है कि  अकाश गंगा पृथ्वी से दूर भाग रही है |

       निहारिका के बारे में वर्णन करें 

निहारिका  एक प्रकार का अत्यधिक प्रकाशमान अकाशीय पिंड है जो   धूल एवं धूल कणों से मिलकर बना होता है  | निहारिका को सौरमंडल का जनक माना जाता है | उसके ध्वस्त होने व  क्रोड के बनने की  प्रक्रिया  शुरुआत लगभग 5 से 5.6 अरब वर्ष पहले हुई व  ग्रह लगभग 4.56 से 4.6 अरब वर्ष पहले बना |

                     क्वैसर क्या है 

यह वैसे आकाश  पिंड है जो आकार में आकाशगंगा से छोटे हैं लेकिन उससे अधिक मात्रा में ऊर्जा का उत्सर्जन करता है | इसकी खोज वर्ष 1962 में की गई थी |

                      नक्षत्र मण्डल क्या है 

  रात्रि में आकाश में तारों के समूह द्वारा बनाई गई विभिन्न आकृतियों को नक्षत्र मंडल कहा जाता है | बिग बियर ऐसा ही एक नक्षत्र मंडल है बहुत आसानी से पहचान में आने वाला नक्षत्र मंडल स्मॉल बियर है | यह सात तारों का समूह है | जो बिग बियर का ही भाग है इसे सप्त ऋषि मंडल भी कहा जाता है | इसी सप्त ऋषि की सहायता से हम ध्रुव तारे की स्थिति को जान सकते हैं | ध्रुव तारा एक ही स्थान पर रहता है | और उत्तर दिशा को बताता है | अब तक 89 नक्षत्र मंडल की पहचान की गई है |

         तारे क्या है ? तारे के बारे में वर्णन करें 

 वैसे आकाशीय पिंड जिसकी  उत्पत्ति आकाशगंगा में मौजूद गैस एवं धुलकन के बादलों से हुई मानी जाती है  | तारा कहलाता है | यह निरंतर ऊर्जा मुक्त करते रहता है | सूर्य भी एक तारा है |

                   तारे का जीवन चक्र 

 जब तारों के कोर में स्थिति इंधन समाप्त होने लगता है |तब  तारे की मृत्यु होने लगती है | मृत होते तारों में अंततः   तीव्र प्रकाश   के साथ  विस्फोट उत्पन्न होता है इसे सुपरनोवा विस्फोट कहा जाता है | विस्फोट के बाद तारे के  अत्यधिक सघन कोर  से बने भाग को न्यूट्रॉन तारा कहा जाता है |छोटे आकार की होने के कारण न्यूट्रॉन तारा तीव्र गति घूर्णन करती है |एवं विद्युत चुंबकीय किरणों का उत्पन्न करता है | ऐसे तारों को पलसर कहा जाता है  | कफी बड़े तारे विस्फोट के बाद ब्लैक होल में परिवर्तित हो जाता है | जिसके अंतर्गत अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण बल होने के कारण कोई भी पदार्थ या प्रकाश किरण इससे बाहर नहीं निकल पाती है |
      सर्वप्रथम कैंब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन मिशेल ने ब्लैक होल से संबंधित विचार प्रस्तुत किए इसके बाद 1976 ई में फ्रांसीसी वैज्ञानिक लाप्लास ने अपनी पुस्तक द सिस्टम ऑफ द वर्ल्ड  मे ब्लैक होल के बारे में विस्तार से चर्चा की |
 

         

स्थलमंडल का विकास कैसे हुआ , जीवन की उत्पति कैसे हुई वर्तमान वायुमंडल के विकास की अवस्थाओं के बारे में बताएं

  स्थलमंडल का विकास कैसे हुआ 






     पृथ्वी की उत्पत्ति के बाद स्थलमंडल का विकास भी  एक श्रमिक प्रक्रिया के दौरान हुआ  | पृथ्वी के रचना के क्रम में जब पदार्थ   गुरुत्व बल के कारण सघन हो रहे थे | तो इससे  अत्यधिक ऊष्मा  उत्पन्न हुई जिसके कारण पदार्थ पिघलने लगे ऐसा पृथ्वी की उत्पत्ति के दौरान एवं उत्पत्ति के तुरंत  बाद हुई |

 अत्यधिक ताप के कारण पृथ्वी आंशिक रूप से द्रव अवस्था में रह गई | तथा भारी एवं हल्के घनत्व वाले पदार्थ घनत्व में अंतर के कारण अलग होना शुरू हो गया | जिसमें भारी पदार्थ जैसे लोहा  पृथ्वी के केंद्र में एवं हल्के पदार्थ  सतह  के ऊपर आ गए समय के  साथ  पृथ्वी के ठंडी होने की प्रक्रिया में ये  पदार्थ ठोस रूप में परिवर्तित होकर छोटे आकार के हो गए | जिससे  भू - पर्पटी   का विकास हुआ |  कुछ समय बाद पृथ्वी का तापमान पुनः बढ़ा  और फिर कम हुआ जिससे पृथ्वी के पदार्थों का अनेक  परतो में विभेदन हुआ हुआ |  जिसके फलस्वरूप पृथ्वी की सतह से कई परतो जैसे भू -पर्पटी , प्रवार  एवं क्रोड का विकास हुआ |

     वायुमंडल  व जलमंडल का विकास कैसे हुआ 

       वर्तमान वायुमंडल के विकास की अवस्थाएं

(1 )  पहली अवस्था में वायुमंडलीय  गैसों का ह्रास हुआ  इस समय वायुमंडल में हाइड्रोजन एवं हीलियम की अधिकता थी |

( 2 )  दूसरी अवस्था में पृथ्वी के अंदर से निकली भाप  एवं जलवाष्प ने  वायुमंडल के विकास में सहयोग किया |

( 3)  तीसरी एवं अंतिम अवस्था में वायुमंडलीय संरचना को  जैव  मंडल की प्रकाश संश्लेषण  की प्रक्रिया में  संशोधित किया |

        पृथ्वी के ठंडा होने और विभेदन  के दौरान  पृथ्वी के अंदरूनी भाग से बहुत से गैस और जल वाष्प  बाहर निकली  जिससे  वर्तमान वायुमंडल का उद्भव  हुआ | आरंभ में वायुमंडल में जलवाष्प नाइट्रोजन कार्बन डाइऑक्साइड मीथेन अमोनिया  अधिक मात्रा में थी जबकि स्वतंत्र ऑक्सीजन की मात्रा बहुत कम थी |

                           गैस उत्सर्जन  

  वैसी प्रक्रिया जिससे पृथ्वी के भीतरी भाग  से गैस धरातल पर आई उस प्रक्रिया को गैस उत्सर्जन कहा जाता है |  इसमें ज्वालामुखी प्रक्रिया सबसे महत्वपूर्ण है |

 पृथ्वी के ठंडा होने के साथ-साथ जलवाष्प  का संघनन भी शुरू हो गया | वायुमंडल में उपस्थित कार्बन डाइऑक्साइड गैस के वर्षा के पानी में घुलने से तापमान में और अधिक गिरावट आई जिसके परिणाम स्वरूप अधिक संघनन के कारण अत्यधिक वर्षा हुई |

 पृथ्वी के धरातल पर वर्षा का जल गर्तो  में इकट्ठा होने लगा   जिससे महासागर का निर्माण हुआ  | यह प्रक्रिया पृथ्वी की उत्पत्ति से लगभग 50 करोड़ सालों के अंतर्गत हुई | इससे पता चलता है कि महासागर 400 करोड़  वर्ष पुराने हैं | एवं 380 करोड़  वर्ष पहले जीवन का  प्रारंभ हुआ | पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के लिए मूलतः कार्बन हाइड्रोजन तथा नाइट्रोजन जैसे तत्व प्रमुख रूप से उत्तरदायी थे |

        जीवन की उत्पत्ति कैसे हुई ?

 पृथ्वी की उत्पत्ति का अंतिम चरण जीवन की उत्पत्ति व विकास से संबंधित है | नि:संदेह प्रारंभिक वायुमंडल जीवन के विकास के लिए अनुकूल नहीं था | आधुनिक वैज्ञानिक जीवन की उत्पत्ति को एक तरफ से रासायनिक प्रतिक्रिया बताते हैं | जिसमें सर्वप्रथम जटिल जैव अणु बने और उनका समुहन हुआ |और यह समूहन  ऐसा था जो पुनः   बनने में सक्षम था | और निर्जीव पदार्थों को जीवित तत्व में परिवर्तित   कर सकता था | हमारे ग्रह पर जीवन के चिन्ह हम  भिन्न भिन्न काल   की चट्टानों में जीवाश्म के रूप में देख सकते हैं | 300 करोड़ वर्ष पुरानी भूगर्भिक  शैलो में पाई जाने वाली सूक्ष्मदर्शी संरचना आज की   शैवाल की संरचना में देखी जा सकती है | 

           भूवैज्ञानिक काल मापक्रम  

 महाकल्प          कल्प           युग            जीवन / मूख्य घटनाएँ

नुतन कल्प    चतुर्थ कल्प    अभिनव        आधुनिक मानव  ,                                                  अत्यंत नुुतन      आदिमानव का विकास                                

सेनोजोइक    तृतीये कल्प 

बुधवार, 16 जून 2021

भूकंप किसे कहते है ? भूकंप के बारे में वर्णन करें

    भूकंप किसे कहते है 




 भूकंप एक ऐसी प्रक्रिया है | जिसमें भूपटल के नीचे या ऊपर चट्टानों के बीच  कंपन या  गुरुत्वाकर्षण की स्थिति में क्षणिक  आव्यवस्था होने पर  पृथ्वी पर हलचल उत्पन्न होती है | इस प्रक्रिया को भूकंप कहा जाता है | अतः भूकंप का सामान्य अर्थ पृथ्वी के कंपन से है | यह कंपन सामान्यतः भूगर्भ में ऊर्जा की विमुक्ति के कारण होती हैं | भूकंप में कंपन होने पर तरंगे उत्पन्न होती है | जो अपने उद्गम केंद्र से चारों ओर फैल जाती हैं|

                               उद्गम केंद्र

        भूकंप का वह केंद्र जहां से भूकंपीय तरंगे उत्पन्न होती है |  भूकंप का उद्गम केंद्र कहा जाता है |

                               अधिकेंद्र 

 वह बिंदु जहां पर सर्वप्रथम  भूकंपीय तरंगे महसूस किया जाता है |  अधिकेंद्र कहलाता है | अधिक केंद्र पर ही सर्वाधिक विनाश होती है | अधिकेंद्र उद्गम केंद्र के ठीक ऊपर 90 डिग्री के कोण पर होता है |

        भूकंपीय तरंगे कितने प्रकार के होते है ?

 भूकंपीय तरंगे मुख्यतः दो प्रकार की होती है 

                     (1) भूगर्भिक तरंगे 

                     (2) धरातलीय तिरंगे

                    भूगर्भिक तरंगे किसे कहते है 

  भूगर्भिक तरंगे वह तरंग है | जो उद्गम केंद्र से ऊर्जा मुक्त होने के दौरान उत्पन्न होती है | तथा पृथ्वी के आंतरिक भागों से सभी दिशाओं में प्रसारित होती है |

                     धरातलीय तरंगे किसे कहते है 

  भूगर्भिक तरंगे  एवं  धरातलीय शैलो  के मध्य अन्योन्य  क्रिया होती है | जिसके कारण एक नए तरंग उत्पन्न होती है जो धरातलीय तरंगे कहलाती है |

    भूकंप से तीन प्रकार की तरंगों का निर्माण होता है

 ( 1 ) P  तरंगे जिसे प्राथमिक या अनुदैध्र्य या संपीडन तरंगे कहते है ध्वनि के समान  इन तरंगो का संचरण वेग होता है  जिसके कारण यह ठोस गैस एवं द्रव तीनों माध्यमों से होकर गुजरती है सिस्मोग्राफ पर सर्वप्रथम  P तरंगों का ही  अंकन होता है 

P  तरंगों की ठोस माध्यम  में गति 7.8 किमी/ सेकंड होती है

 ( 2 ) S तरंगे  P   तरंग के उत्पत्ति के बाद  S तरंग का निर्माण होता  है जिसे द्वितीयक  या अनुप्रस्थ तरंग कहा जाता है  इस तरंग का संचरण वेग  अपेक्षाकृत कम होता है यह केवल ठोस माध्यम से ही होकर गुजर सकती हैं इसकी गति 4.5 से 6 किलोमीटर/सेकंड होती है

 ( 3 ) L   तरंग का संचरण केवल धरातलीय भाग पर होता है इसका वेग सबसे कम होता है इसका  वेग  1.5 से 3 किमी /सेकण्ड होती है  यह धरातल पर सबसे अंतिम में पहुंचती है आड़े तिरछे धक्का देकर चली जाती है  जिसके कारण सर्वाधिक विनाशक होती है

        भूकंप आने के कारण को बताएं 

      भूकंप आने के प्रमुख कारण निम्नलिखित है

 (1)  जब ज्वालामुखी विस्फोट होती है जिसके कारण कंपन उत्पन्न होती है | जो भूकंप को जन्म देती है |

(2)  जब पृथ्वी की प्लेटों में असंतुलन उत्पन्न होती है | तो भूकंप का जन्म होता है |

 (3)  बृहतआकार जलाशयों के जल भर से सतह  पर असंतुलित दबाव पड़ता है  | जिसके कारण भूकंप उत्पन्न हो सकती है |

 (4)   वलन  या  भ्रंश जैसी टेक्टोनिक क्रियाओं से भी भूकंप उत्पन्न होती है |

(5)  हिमखंड  या शिलाओं  के खिसकने तथा गुफाओं की छतों के धंस जाने या खानो की छतो के गिर जाने से भी भूकंप आता है | 

     भूकंप का पूर्वानुमान कैसे लगाया जाता है 

 भूकंप का  पूर्वानुमान लगाने में मानव एवं विज्ञान को अभी भी पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं हुई है |  लेकिन  निम्नलिखित कारको द्वारा  भूकंप आने के कुछ संकेत प्राप्त करते हैं |

                       रेडॉन गैस का उत्सर्जन 

  किसी बड़े भूकंप के आने से पूर्व रेडॉन गैस का  उत्सर्जन बढ़ जाता है |  अतः  रेडॉन गैस के निकास पर दृष्टि रखने से किसी बड़े भूकंप के आने की चेतावनी मिल सकती है |

                        पशुओं का आचरण 

  प्रायः ऐसा देखने में आया है |  कि किसी बड़े भूकंप के आने से पहले जीव जंतु विशेषत:  बिलो में रहने वाले जीव जंतु असाधारण ढंग से व्यवहार करने लगती है |   वे अपने छिपने के स्थान से बाहर निकल आते हैं | चिड़िया जोर-जोर से चह  चहाती है |  कुत्ते एक नियत प्रकार से  भौकते  या रोते हैं |

                    भूकंप की माप कैसे करते है 

 भूकंपीय घटनाओं का मापन भूकंपीय  तीव्रता एवं आघात की तीव्रता के आधार पर किया जाता है |  भूकंप की तीव्रता की मापनी  रिक्टर  स्केल  के नाम से जाना जाता है |  यह एक लोगरिथमिक स्केल होता है  | जिसमें 0 से 10 तक पाठ्यांक  दर्ज होता है | इसमें   प्रत्येक पाठयांक  पिछले  पाठयांक  से 10 गुना  अधिक परिमाण को दर्शाता है |

                           समभूकंप रेखा

        समान भूकंप की तीव्रता को मिलाने वाली रेखा को समभूकंप रेखा कहा जाता है

 आघात की तीव्रता या गहनता भूकंपीय झटको से हुई प्रत्यक्ष हानि द्वारा निर्धारित की जाती है | इसकी गहनता का पाठयांक  1 से 12 तक होती है |

                        सह  भूकंप रेखा 

 एक ही समय पर पहुंचने वाली तरंगों को मिलाने वाली रेखा को सह  भूकंप रेखा कहा जाता है 

                    भूकंप का विश्व वितरण

(1)  परिप्रशांत पेटी - परिप्रशांत  पेटी धरातल की सबसे बृहत एवं विस्तृत भूकंपीय पेटी है |  विश्व के दो तिहाई भूकंप इसी क्षेत्र में आता है | यह ज्वालामुखी या अग्निवलय वाले  क्षेत्र है | जो  न्यूजीलैंड ( प्रशांत के पश्चिमी तट या ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप के पूर्वी तट )  से लेकर कमचट्का प्रायद्वीप आलस्का होते हुए  (  उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट या  प्रशांत महासागर के पूर्वी तट ) फॉकलैंड तक फैला है  | यह प्लेटो के अभिसरण सीमा क्षेत्र में अवस्थित है  एवं नवीन मोड़दार पर्वतो  एवं ज्वालामुखी का क्षेत्र है |

( 2)  मध्य महाद्वीपीय पेटी -  यह भूमध्य सागर से लेकर पूर्वी द्वीप समूह (  भूमध्य सागर , काकेशस ,  तुर्की ,  ईरान,  आर्मीनिया ,  बलूचिस्तान , महान हिमालय के क्षेत्र यूनान ,  म्यांमार , इंडोनेशिया ) तक  फैली है |  मुख्यतः इन क्षेत्रों में संतुलन पूर्वक भूकंप आता है | इस पेटी में  विश्व के 21% भूकंप आता है |

 ( 3 )  मध्य अटलांटिक  पेटी -  यह पेटी अटलांटिक महासागर में उपस्थित मध्य अटलांटिक कटक के सहारे आइसलैंड से लेकर दक्षिण में बोवेट द्वीप तक फैली हुई है  |इसमें ज्वालामुखी उद्गार तथा कटक निर्माण प्रक्रिया के द्वारा भूकंप आता है |

                       भूकंप के प्रभाव 

 भूकंप एक प्राकृतिक आपदा है  | जिसके कारण स्थलखंड पर भूमि का हिलना धरातलीय विसंगति भूस्खलन  धरातलीय झुकाव हिमस्खलन जैसे प्रभाव पड़ते हैं |  अतिरिक्त तटबंध के टूटने आग लगने इमारतों का ध्वस्त होना वस्तुओं का गिरना इन सभी के कारण   जन धन की काफी हानि होती है | समुद्री भूकंपीय तरंगों के कारण सुनामी लहरें पैदा होती है | भूकंप से सर्वत्र विनाश क्रिया ही दृष्टिगोचर नहीं होती है | बल्कि कभी-कभी नवीन भू जल स्रोत की धारा भी वह निकलती है ₹  या खारे की जगह मीठा जल स्रोत भी परिलक्षित हो जाती है |

प्राकृतिक संसाधन किसे कहते है ?प्राकृतिक संसाधन के बारे में वर्णन करें

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