शुक्रवार, 18 जून 2021

भू -आकृति विज्ञान किसे कहते है , पृथ्वी की आंतरिक दशाएं , सियाल किसे कहते है , सिमा किसे कहते है , निफे किसे कहते है ,

       भू -आकृति विज्ञान  किसे कहते है 

 पृथ्वी की उत्पत्ति एवं संरचना के साथ-साथ उसके विविध स्थलाकृतिक  लक्ष्णो एवं उसके कारणों को समझाने के लिए भू आकृति विज्ञान का अध्ययन आवश्यक है | 

        पृथ्वी की आंतरिक दशाएं के बारे में चर्चा करें 

 पृथ्वी के आंतरिक भाग की वास्तविक स्थिति तथा उसकी बनावट के विषय में सही ज्ञान प्राप्त करना असंभव नहीं है | लेकिन कठिन कार्य जरूर है | क्योंकि पृथ्वी का आंतरिक भाग मानव के लिए दृश्य नहीं है | पृथ्वी पर सबसे आसानी से उपलब्ध ठोस पदार्थ धरातलीय अथवा वे चट्टाने है जो हम  खनन क्षेत्रों से प्राप्त करते हैं | दक्षिण अफ्रीका में सोने की खाने 3 से 4 किमी तक गहरी है | इससे अधिक गहराई में जा पाना असंभव है | क्योंकि इतनी गहराई पर तापमान बहुत अधिक होता है | आज तक सबसे गहरा प्रवेधन  आर्कटिक महासागर की कोला क्षेत्र में 12 किमी की गहराई तक ही किया गया है |

 पृथ्वी की आंतरिक संरचना की जानकारी देने वाले स्रोतों को दो वर्गों में बांटा जा सकता है | 

                ( 1 )  प्राकृतिक स्रोत 

                ( 2 )  अप्राकृतिक स्रोत  

                 ( 1 )  प्राकृतिक स्रोत   

 प्राकृतिक स्रोतों में गुरुत्वाकर्षण ज्वालामुखी और भूकंप संबंधी क्रियाएं शामिल है |

                        गुरुत्वाकर्षण बल 

   गुरुत्वाकर्षण बल पृथ्वी के धरातल पर विभिन्न अक्षांशों पर गुरुत्वाकर्षण बल एक समान नहीं होता है | या ध्रुवों पर अधिक एवं भूमध्य रेखा पर बहुत कम होता है | गुरुत्व का मान पदार्थ के द्रव्यमान के अनुसार भी बदलता है | पृथ्वी के भीतर पदार्थों का असमान वितरण भी इस सिद्धांत को प्रभावित करता है https://kindui3.blogspot.com/2021/06/blog-post_90.html   | 

                        ज्वालामुखी  

 ज्वालामुखी उद्गगार पृथ्वी की आंतरिक संरचना की  प्रत्यक्ष  जानकारी का एक अन्य  स्रोत है | जब कभी भी ज्वालामुखी उद्गार से लावा पृथ्वी के धरातल पर आता है | तो यह प्रयोगशाला अन्वेषण के लिए उपलब्ध होता है | 




                            भूकंपीय तरंगे 

  भूकंपीय तरंगे भी पृथ्वी की आंतरिक जानकारी का एक महत्वपूर्ण स्रोत  है  | 

                    ( 2 )  अप्राकृतिक स्रोत 

 अप्राकृतिक स्रोत में ताप दबाव व घनत्व शामिल है |

                                तापमान 

 तापमान सामान्यत:  भू पृष्ठ में भूगर्भ की ओर जाने पर प्रति 32 मीटर पर 1 डिग्री सेल्सियस की दर से तापमान में वृद्धि होती है लेकिन तापमान वृद्धि की यह दर एक सीमा तक ही सीमित  रहती है | 

                                 दबाव 

  पृथ्वी के आंतरिक भाग में किसी स्थान पर 1 वर्ग सेंटीमीटर क्षेत्रफल पर पड़ने वाला भार दबाव है 50 किमी की गहराई तक दबाव स्थल की अपेक्षा 13000 गुना अधिक होता है |

                               घनत्व 

 भूपटल का अधिकांश भाग महाद्वीपों का बना है | जिसकी रचना अवसादी चट्टानों से हुई है | इसका औसत घनत्व 2.7 है | जबकि न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत के अनुसार संपूर्ण पृथ्वी का घनत्व 5.5 है | अर्थात पृथ्वी के आंतरिक भागों का घनत्व अधिक है |

                     पृथ्वी का आंतरिक संगठन

                                   क्रस्ट 

     क्रस्ट  पृथ्वी का सबसे बाहरी भाग है | महासागरों में भूपर्पटी की मोटाई महाद्वीपों की तुलना में कम है | महासागरों में इसकी औसत मोटाई 5 किमी है | वही महाद्वीपों में औसत मोटाई 30 किमी है | महाद्वीपीय भूपर्पटी भारी चट्टानों से बनी है | और इसका घनत्व 3 ग्राम प्रति घन सेमी है | महासागरों के नीचे भूपर्पटी कि चट्टाने बेसाल्ट निर्मित है | इसका घनत्व 2.7 ग्राम प्रति घन सेमी है |

                                मेंटल

 भूगर्भ में पपर्टी  के नीचे का भाग मेंटल कहलाता है | यह मोहो असांतत्य से  आरंभ होकर 2900 किमी की गहराई तक पाया जाता है  | मेंटल का ऊपरी भाग दुर्बलता मंडल कहा जाता है | जिसका विस्तार 400 किमी तक आंका गया है | ज्वालामुखी उद्गार के दौरान जो लावा धरातल पर पहुंचता है | उसका मुख्य स्रोत यही दुर्बलता मंडल है | मेंटल का घनत्व  भूपर्पटी की चट्टानों से अधिक है | पृथ्वी के आयतन का 83% तथा द्रव्यमान का 67% भाग   इसमें व्याप्त है |

                                   क्रोड

 क्रोड व मेंटल की सीमा 2900 किमी की गहराई पर है | बाह्रा क्रोड   आंशिक  तरल अवस्था में है | जबकि आंतरिक क्रोड  ठोस अवस्था में है | बाह्रा क्रोड  तरल अवस्था में इसलिए है क्योंकि यहां दाब की तुलना में तापमान अधिक होता है |  जबकि नीचे बढ़ने पर तापमान की अपेक्षा दाब अधिक हो जाता है | इसलिए आंतरिक क्रोड ठोस अवस्था में है | 

                    पृथ्वी का रासायनिक संगठन 

 प्रख्यात भूगर्भ शास्त्री एडवर्ड स्वेेश ने  सर्वप्रथम पृथ्वी का रासायनिक संगठन के बारे में अपना मत प्रकट किया  | इनके अनुसार भूपटल का ऊपरी भाग  अवसादी शैलो का बना हुआ है | अवसादी शैलो  की गहराई तथा घनत्व बहुत ही कम है | इसके ऊपरी भाग में हल्के सिलिकेट तथा निचले भाग में भारी सिलिकेट  के पदार्थ है | 

            इसके नीचे स्वेस  ने तीन परते मानी है | 

                             ( 1 )  सियाल  

 अवसादी शैलो के नीचे सियाल की परत पाई जाती है  | जिसका निर्माण सिलिका एवं एलुमिनियम से हुई है| इस परत की औसत गहराई 50 से 300 किमी तक है | तथा इसका घनत्व 2.75 से 2.90 तक है | यह परत ग्रेनाइट शैलो की है |  जिसमें अम्लीय  अंशो की प्रधानता है  | सियाल में पोटैशियम सोडियम एवं एलुमिनियम के सिलिकेट अधिक है | महाद्वीपों का निर्माण सियाल से ही हुआ है | यह अपने से नीचे वाली परत से हल्के होने के कारण उस पर तैर रहा है | इस परत को लिथोस्फीयर भी कहा जाता है | 

                               ( 2 )  सिमा  

 यह  सियाल के नीचे अवस्थित है | और इसमें  सिलिका एवं मैग्नीशियम की प्रधानता होती है  | इस परत का घनत्व 2.90 से    4.75 है | इसकी गहराई 1000 से 2000 किमी तक है | इस परत में क्षारीय  अंश की प्रधानता है  |  यहां मैग्निशियम कैलशियम एवं लोहे के सिलिकेट मिलते  हैं  | सामान्यता इस भाग को पायरोस्फीयर भी कहा जाता है  |

                                  ( 3 )  निफे   

 यह सिमा के निचे तीसरी  एवं अंतिम परत है | इस परत में   निकिल एवं लोहा की प्रधानता होती है | यह परत पृथ्वी के केंद्र तक विस्तृत है | एवं इसका घनत्व 11 से 13 है  पृथ्वी के आंतरिक कोर में लोहे की उपस्थिति पृथ्वी की चुंबकीय शक्ति को प्रमाणित करती है |

 इसे  बैरीस्फीयर भी कहा जाता है | 

 

 

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