गुरुवार, 15 जुलाई 2021

उद्योग किसे कहते हैं ,कुटीर उधोग क्या है , लघु उधोग क्या है , वृहत उधोग क्या है ?

           उद्योग क्या है






   जब  कच्चे माल को संशोधित और परिवर्तित करके  मानवीय आवश्यकताओं के अनुरूप वस्तु तैयार किया जाता है उसे उधोग कहा जाता है | 

       अर्थात  उद्योग वैसी आर्थिक प्रक्रिया है जो प्राकृतिक संसाधनों के प्रसंस्करण एवं मूल्यवर्धन पर आधारित है | एवं मानव की मूलभूत आवश्यकता की आवश्यक  वस्तु का निर्माण करती है  उद्योग कहलाती है | उद्योग किसी भी देश के आर्थिक विकास के स्तर  को निर्धारित करती  हैं |

 उद्योगों के विकास में भौगोलिक तकनीकी एवं पूंजीगत कारकों के साथ-साथ संसाधनों के प्रबंधन एवं संरक्षण की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है | इसी कारण से विकसित देशों में औद्योगिक विकास तीव्र गति से हुआ है |

                          उधोग का महत्त्व 

 उद्योग किसी भी देश के आर्थिक विकास के स्तर  को निर्धारित करती  हैं | किसी भी देश की प्रगति  उस देश की औधोगिक विकास पर निर्भर करती है | जो भी देश जितना अधिक माल आयत करता है और उस माल का अधिकतम उपयोग करके कई प्रकार का सामग्री का निर्माण करती है वह देश विकसित एवं संपन्न होता है | भारत एक विकासशील देश है लेकिन यहाँ जितनी उपलब्ध प्राकृतिक एवं मानव संसाधन के आधार पर विकसित देश बनने की पूर्ण संभावना है | भारत अब आत्मनिर्भरता की तरफ धीरे धीरे बढ़ रही है भारत की राष्टीय शक्ति में वृद्धि हुई है |

        उद्योगों को कई तरह से उसका वर्गीकरण करते हैं 

 आकार के आधार पर उद्योगों को 3 वर्गों में बांटा गया है

          (1) कुटीर उद्योग

          (2) लघु उद्योग

         (3)  वृहत  उद्योग

                          (1) कुटीर उद्योग

 कुटीर उद्योग निर्माण की सबसे  छोटा इकाई है | इस प्रकार के उद्योग में शिल्पकार स्थानीय कच्चे माल का उपयोग करते हैं |  एवं साधारण औजारों द्वारा या साधारण मशीनों द्वारा परिवार के सभी सदस्य मिलकर अपने दैनिक जीवन के उपभोग की वस्तुओं का उत्पादन करते हैं तथा इसे स्थानीय बाजार में बेचा जाता है | कुटीर उधोग भारत का प्राचीनतम उधोग में से एक है जो अधिकतर ग्रामीण इलाको में यह उधोग विकसित है 

 जैसे खाद्य पदार्थ कपड़ा बर्तन औजार फर्नीचर जूते एवं लघु मूर्तियां उत्पादन की जाती है |

                           (2) लघु उद्योग

 लघु उधोग कुटीर उधोग से बड़ा उधोग है इसमें कम पूंजी और छोटे मशीनों के माध्यम से यह उधोग संचालित की जाती है |  लघु उद्योग में भी स्थानीय कच्चे माल का उपयोग करके वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है | इसमें अर्ध कुशल श्रमिक व शक्ति के साधनों से चलने वाले यंत्रों का प्रयोग किया जाता है | इस उद्योग में रोजगार के अवसर अधिक होते हैं | बहुत से देश अपनी जनसंख्या को रोजगार उपलब्ध करवाने के लिए इस प्रकार के श्रम सघन छोटे पैमाने के उद्योग प्रारम्भ किए हैं |

                           (3) वृहत उधोग 

 यह बहुत बड़े आकार के उद्योग है  इस  उद्योग के लिए विशाल बाजार,  विभिन्न प्रकार का कच्चा माल , शक्ति के साधन , कुशल श्रमिक, , विकसित प्रौद्योगिकी  अधिक उत्पादन एवं अधिक पूंजी की आवश्यकता होती है | पिछले कई शतक से इसका विकास हुआ है | पहले यह उद्योग ग्रेट ब्रिटेन संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्वी विभाग एवं यूरोप में लगाया गया था | परंतु वर्तमान समय में इसका विस्तार विश्व के सभी भागों में हो गया है |

  कच्चे माल के आधार पर उद्योगों को 5 वर्गों में बांटा गया है

                   (1)  कृषि आधारित उद्योग

 वर्तमान समय में कृषि आधारित उद्योग भी  बहुत बड़े पैमाने पर किया जा रहा है | इस उद्योग में खेतों से प्राप्त कच्चे माल को विभिन्न प्रक्रियाओं द्वारा तैयार माल में बदलकर बेचने के लिए ग्रामीण एवं नगरीय बाजारों में भेजा जाता है |

 कृषि आधारित  उद्योग में  भोजन तैयार करने वाले उद्योग , शक्कर अचार , फलो के रस , पेय पदार्थ जैसे चाय , कॉफी , मसाले , तेल एवं वस्त्र तथा रबड़ उधोग आतें है |

                    (2) खनिज आधारित उधोग 

खनिज आधारित उधोग में  खनिजों के कच्चे माल का प्रयोग करके  आवश्यक वस्तु का उत्पादन किया जाता है | इस उद्य में कुछ लौह अंश  वाले भी होते हैं कुछ अलौह  अंश वाले भी  |

 जैसे -   एलमुनियम तांबा एवं जवाहरत उद्योग  सीमेंट मिट्टी के बर्तन आदि उद्योग में  आध्यात्विक खनिजों का प्रयोग होता है 

                   (3) रसायन आधारित उधोग 

रसायन आधारित उधोग  में  प्राकृतिक रूप में पाए जाने वाले रासायनिक खनिजों का उपयोग होता है तथा उससे आवश्यक वस्तु का निर्माण किया जाता है | 

जैसे -  पेट्रो रसायन उद्योग में खनिज तेल अर्थात पेट्रोलियम का उपयोग होता है |

                       (4) वन आधारित उधोग 

वन आधारित उधोग  में  वनों से प्राप्त कई मुख्य एवं गौण  उपज कच्चे माल के रूप में  प्राप्त होता है |   जिसका उपयोग करके आवश्यक वस्तु का निर्माण किया जाता है | 

जैसे फर्नीचर उद्योग के लिए इमारती लकड़ी कागज उद्योग के लिए लकड़ी बांस एवं घास  तथा लाख उद्योग के लिए लाख वनो से ही प्राप्त होता है |

                    (5) पशु आधारित उधोग 

          इस उधोग में चमड़ा उधोग के लिए चमड़ा पशुओ से ही प्राप्त होता है | तथा ऊनि वस्त्र उधोग के लिए उन पशुओ से ही प्राप्त होता है |

       उत्पादन या उत्पाद के आधार पर उद्योगों को दो वर्गों में बांटा गया है |

                 (1) आधारभूत उधोग 

 वैसे उद्योग  जिसके उत्पाद को अन्य वस्तुएं बनाने के लिए कच्चे माल के रूप में प्रयोग में लाया जाता है उन्हें आधारभूत उद्योग कहा जाता है |

 जैसे  -  लोहा इस्पात उद्योग -  वस्त्र उद्योग के लिए मशीन - उपभोक्ता के उपयोग के लिए कपड़ा |

              (2)  उपभोक्ता वस्तु उद्योग

 वैसे उद्योग जिसमें वैसे सामानों का उत्पादन किया जाता है जो प्रत्यक्ष रूप से उपभोक्ता द्वारा उपयोग कर लिया जाता है | उपभोक्ता वस्तु उद्योग कहलाता है |

  जैसे - रोटी (ब्रेड)  बिस्किट चाय साबुन कागज टेलीविजन  एवं  श्रृंगार का सामान आदि |

   स्वामित्व के आधार पर उद्योगों को तीन भागों में बांटा गया है 

            (1) सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग

 वैसे उद्योग जो सरकार के अधीन होते हैं सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग होते हैं  सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग कहलाते हैं | भारत में बहुत से ऐसे उद्योग है | जो सार्वजनिक क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं जो सरकार के अधीन है | समाजवादी देशों में भी बहुत से उद्योग  सरकार के अधीन होते हैं |

                  (2) निजी क्षेत्र के उद्योग

 वैसे उद्योग जिसका स्वामित्व व्यक्तिगत निवेशकों के पास होता है ये  निजी संगठनों द्वारा संचालित होते हैं | पूंजीवादी देशों में अधिकतर उद्योग इसी प्रकार का उद्योग विकसित है |

                  (3) संयुक्त  क्षेत्र उद्योग

 वैसे उद्योग जिसका संचालन संयुक्त कंपनी के द्वारा या किसी निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के संयुक्त प्रयासों के द्वारा संचालन होता है  संयुक्त क्षेत्र उद्योग कहलाता है |

           उद्योगों को प्रभावित करने वाले कारक

 वैसे कारक जो उद्योग की स्थिति या स्थानीयकरण को प्रभावित करता है | जैसे कच्चे माल की उपलब्धता भूमि जल , श्रम शक्ति , पूंजी,   परिवहन और बाजार  उद्योग उसी स्थान पर केंद्रित होता है जहां इसमें से कुछ या  सभी कारक आसानी से उपलब्ध हो | कभी-कभी  पिछड़े क्षेत्रों में उद्योग स्थापित करने के लिए सरकार बहुत से कम दाम पर विद्युत उपलब्धता कम परिवहन लागत तथा अन्य अवसंरचना जैसे प्रोत्साहन  प्रदान करती है | औद्योगिकरण से प्रायः नगरों और शहरों का विकास एवं वृद्धि होती है |

                       विश्व के प्रमुख उद्योग

                    उद्योग किसी भी व्यवस्थित तथा क्रमबद्ध कार्य द्वारा प्राकृतिक संसाधनों को विनिर्मित  वस्तुओं  में बदलने को कहा जाता है | औद्योगिक विकास के इतिहास में औद्योगिक क्रांति एक महत्वपूर्ण घटना थी | यह क्रांति यूनाइटेड किंगडम से प्रारंभ हुई तथा पूरा यूरोप इसके प्रसार से प्रभावित  हुआ | हालांकि वैश्विक स्तर पर उद्योगों के प्रादेशिक वितरण में बहुत आसमानता पाई जाती है | यही नहीं यह आसामानता एक देश के विभिन्न भागों में भी देखने को मिलती है |

    उद्योगों के स्थानीयकरण के संबंध में कच्चे माल की उपलब्धता शक्ति परिवहन के साधन संस्ता  एवं कुशल श्रम , पूंजी, प्रौद्योगिकी एवं सरकार की नीति आदि का विशेष महत्व होता है |

                 कुछ प्रमुख उद्योग निम्नलिखित है

                      लौह इस्पात उद्योग

 लौह इस्पात उद्योग विश्व का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उद्योग है | इसे  उद्योगो का जननी  भी कहा जाता है | क्योंकि लौह इस्पात उद्योग में बड़े-बड़े मशीनों का निर्माण होता है | जिससे अन्य उद्योग संचालित होते हैं  | लौह इस्पात उद्योग एक जटिल उद्योग है | जिसमें अधिक पूंजी की आवश्यकता होती है | इसलिए उतरी अमेरिका यूरोप और एशिया के विकसित देशों में इसका केंद्रीकरण ज्यादा है |

                         जूट उद्योग

         जूट उद्योग एक महत्वपूर्ण उद्योग है विश्व का पहला जूट उद्योग स्कॉटलैंड के टुंडी में स्थापित किया गया था | लेकिन वर्तमान समय में भारत एवं बांग्लादेश   में जूट उद्योग का केंद्रीकरण देखने को मिलता है | इसके अलावा जर्मनी , ब्रिटेन, फ्रांस , एवं इटली में भी जूट उद्योग देखने को मिलता है | भारत में जूट उद्योग का विकास मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल में  हुगली नदी के तट के सहारे हुआ | वर्तमान समय में भारत जूट उद्योग में प्रथम स्थान रखता है |

                      सूती वस्त्र उद्योग

 सूती वस्त्र उद्योग एक महत्वपूर्ण उद्योग है सूती वस्त्र उद्योग के लिए कच्चे माल के रूप में अच्छी किस्म की कपास चाहिए | विश्व की 50% से अधिक कपास का उत्पादन भारत चीन संयुक्त राज्य अमेरिका पाकिस्तान उज़्बेकिस्तान एवं मिस्र  में किया जाता है | 

 वर्तमान समय में सूती वस्त्र उत्पादन में चीन प्रथम स्थान पर है | शंघाई को चीन का मैनचेस्टर कहा जाता है | अहमदाबाद को भारत का मैनचेस्टर कहा जाता है |

                         रेशम वस्त्र उधोग 

 वस्त्र उत्पादन के लिए रेशम उद्योग महत्वपूर्ण उद्योग है |  विश्व में कच्चे रेशम का सबसे बड़ा उत्पादक चीन है | इसके बाद जापान भूतपूर्व सोवियत संघ एवं भारत का स्थान आता है | चीन कच्चे सिल्क का निर्यात करता है |   संयुक्त राज्य अमेरिका के सबसे बड़ा आयातक देश है | सिल्क के वस्त्र के उत्पादन में चीन का प्रथम स्थान है |

                       ऊनि वस्त्र उधोग 

 ऊनी वस्त्र उद्योग का केंद्रीयकरण मध्य अक्षांशीय  विकसित देशों में देखने को मिलता है | ऑस्ट्रेलिया न्यूजीलैंड अर्जेंटीना एवं अफ्रीका ऊन के प्रमुख उत्पादक देश है | लेकिन इन देशों की जनसंख्या काफी कम होने के कारण तथा ऊनी  वस्त्रों कि मांग अधिक नहीं होने के कारण ऊनी  वस्त्र उद्योग का विकास बहुत कम हुआ है | अत: यह  देश ऊन के  निर्यातक है |

 ऊन की प्राप्ति भेड़ ,  बकरी ,  खरगोश , तथा लामा आदि से प्राप्त होती है | उत्पादन की दृष्टि से भेड़ का ऊन सर्वाधिक महत्वपूर्ण है |  परंतु गुणवत्ता की दृष्टि से विश्व की सर्वश्रेष्ठ ऊन अंगोरा होती है | जो  खरगोश से प्राप्त होती है | पशमीना एक बकरी है जिससे ऊन प्राप्त की जाती है | ब्रिटेन की लिटिस्यु भेड़ की   सबसे लंबी ऊन प्रदान करने वाली नस्लें है | 

                        कागज  उद्योग

 कागज उद्योग भी एक महत्वपूर्ण उद्योग है जो विश्व का 90% कागज  काष्ट लुगदी  से तैयार किया जाता है | कागज उद्योग के स्थायी करण में कच्चे माल की सुविधा सर्वाधिक महत्वपूर्ण है |

                     पेट्रो - रसायन उधोग 

 वैसे उद्योग जो पेट्रोलियम से प्राप्त होता है पेट्रो रसायन उद्योग कहलाता है | इसी के कारण इसका संकेंद्रण तेल शोधनशाला या तटीय क्षेत्रों में पाया जाता है | उर्वरक प्लास्टिक  रेयॉन  जैसे कृत्रिम रेशे इस उद्योग के प्रमुख उत्पाद है |

             सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी)उद्योग

 सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग विश्व के अनेक देशों में इसका विकास काफी तेजी से हुआ है | वर्तमान समय में यह एक महत्वपूर्ण उद्योग बन चुका है | सूचना प्रौद्योगिकी से तात्पर्य आंकड़ों की प्राप्ति सूचना का संग्रह , सुरक्षा ,  स्थानांतरण परिवर्तन ,  अध्ययन इत्यादि कार्यों के उपयोग संचालन हेतु आवश्यक कंप्यूटर हार्डवेयर व सॉफ्टवेयर के अनुप्रयोग से है |  सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग वैश्विक उद्योग का एक अभिन्न अंग बन गया है | तथा वर्तमान समय में यह वाणिज्य और व्यापार के लिए भी महत्वपूर्ण हो गया है | सूचना प्रौद्योगिकी के बढ़ते महत्व के परिणाम स्वरूप या विश्व में एक अलग उद्योग के रूप में स्थापित हो गया है | वर्तमान समय में सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग  अन्य उद्योग की तुलना में किसी अर्थव्यवस्था में उत्पादकता विशेषता आदि  की तुलना में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है | और वैश्विक अर्थव्यवस्था के समृद्धि का एक प्रमुख घटक हो गया है | सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग शिक्षा , स्वास्थ्य , व्यापार , अनुसंधान व विकास प्रशासन ( ई -गवर्नेंस )  पारदर्शिता , कार्यक्षमता में वृद्धि आदि से बेहतर योगदान दे रहा है | बंगलुरु भारत में सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग के प्रमुख केंद्र है |


                      

 











सोमवार, 5 जुलाई 2021

संसाधन किसे कहते है ? , खनिज संसाधन किसे कहते है ,ऊर्जा संसाधन किसे कहते है

      संसाधन क्या है 

वे सभी वस्तुएँ जो मानवीय आवशयकताओ व उसकी इच्छा की पूर्ति करता है संसाधन कहलाता है 

         संसाधन का वर्गीकरण 

हमलोग संसाधन के बारे में तो जान लिए  लेकिन सवाल यह उठता है की संसाधन कितने प्रकार के होते है 
  हमारे पर्यावरण में देखा जाए तो पता चलता है की पर्यावरण में दो प्रकार वस्तुएं देखने को मिलती है एक जो हमें प्रकृति से हमें प्राप्त होती है तो दूसरा वह पदार्थ है जिसका निर्माण मनुष्य खुद करता है 
इस प्रकार वस्तु के आधार पर संसाधन दो प्रकार के होता है 

         (1) प्राकृतिक संसाधन 

       (2) मानवनिर्मित संसाधन 

               (1)  प्राकृतिक संसाधन किसे कहते है या प्राकृतिक संसाधन क्या है 


      वैसे वस्तुयें या वैसा संसाधन जो हमें प्रकृति से प्राप्त होती है अर्थात जिसका निर्माण प्रकृति द्वारा होती है प्राकृतिक संसाधन कहलाता है |
 
जैसे - कोयला , जल सौर ऊर्जा इत्यादि  |

      प्राकृतिक संसाधन दो प्रकार के होता है 

       (i) जैविक संसाधन 

      (ii) अजैविक संसाधन 


       (i) जैविक संसाधन क्या है या जैविक संसाधन किसे कहते है 


        वैसे वस्तुएं जिसका निर्माण जीवित प्राणी से वनस्पति के द्वारा होता है तथा जिसका उपयोग मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करता है  जैविक संसाधन कहलाता है |

                   (ii) अजैविक संसाधन क्या है 

वैसी वस्तुएं या संसाधन जो अजीवित होती है जिसका उपयोग मनुष्य अपनी आवशयकताओ की पूर्ति के लिए करता है अजैविक संसाधन कहलाता है |

जैसे -  खनिज संसाधन , मृदा आदि ये सभी  अजैविक संसाधन है |

           (2) मानवनिर्मित संसाधन क्या है 

वैसी वस्तुएं जिसका निर्माण मनुष्य द्वारा अपनी आवशयकताओ की पूर्ति हेतु किया जाता है  मानवनिर्मित संसाधन संसाधन कहलाता है |

       खनिज  संसाधन क्या है 

 वैसे पदार्थ जिसको पृथ्वी के गर्भ से प्राप्त किया जाता है खनिज संसाधन कहलाता है |इसकी पहचान इसकी भौतिक और रासायनिक गुणों से किया जाता है |





 खनिज पदार्थों को निम्न प्रक्रिया द्वारा प्राप्त किया जा सकता है |

                       आखनन प्रक्रिया

        आखनन प्रक्रिया में चट्टानों को खोदकर खनिज प्राप्त किया जाता है |

                   विवृत्त खनन प्रक्रिया

विवृत्त खनन प्रक्रिया में कम गहराई के गड्ढे खोदकर खनिज प्राप्त किया जाता है | कई स्थानों पर लोहा कोयला तांबा इसी प्रकार के खनन द्वारा निकाले जाते हैं |

                         वेधन प्रक्रिया

 जब तरल एवं गैस यह पदार्थों को प्राप्त करने के लिए संकरे एवं गहरे सुराख किए जाते हैं | इस विधि को वेधन प्रक्रिया कहा जाता है |

 पेट्रोलियम जैसे पदार्थों के लिए वेधन  प्रक्रिया ही अपनाये  जाते हैं |

                      खनिजों के प्रकार 

(1) धात्विक खनिज  (2) अधात्विक खनिज (3)  खनिज ईंधन 

                   (1) धात्विक खनिज 

 पृथ्वी के गर्भ से निकाली गई वैसे  खनिज संसाधन  जिसमें धातु की मात्रा उपस्थित रहती है धात्विक खनिज कहलाता है |

 धात्विक खनिजों को लौह अयस्क की उपस्थिति के आधार पर निम्न दो भागों में बांटा गया है |

             (i)  लौह खनिज            (ii) अलौह  खनिज

                           (i)  लौह खनिज 

 पृथ्वी के गर्भ से निकाली गई वैसे धात्विक खनिज जिसमें लोहे का अंश  उपस्थित रहता है | उस धात्विक खनिज को लौह खनिज कहा जाता है |

 जैसे -  लौह अयस्क  मैंगनीज क्रोमियम निकील  टंगस्टन कोबाल्ट वेनेडियम आदि |

                          (ii) अलौह  खनिज 

 पृथ्वी के गर्भ से निकाली गई वैसे धात्विक खनिज जिसमे लोहे का अंश नहीं उपस्थित रहता है | अलौह  खनिज कहलाता है |

 जैसे -  तांबा एलुमिनियम  टीन  सीसा सोना चांदी प्लैटिनम जिंक  अभ्रक आदि |

                   (2) अधात्विक खनिज

 पृथ्वी के गर्भ से निकाली गई वैसे खनिज जिसमें धातु का अंश नहीं पाया जाता है  अधात्विक खनिज कहलाता है |

 जैसे - जिप्सम नमक नाइट्रेट गंधक संगमरमर हीरा ग्रेनाइट आदि |

                      (3)  खनिज ईंधन 

 पृथ्वी के गर्भ से निकाली गई वैसे पदार्थ जिससे में कोयला पेट्रोलियम प्राकृतिक गैस यूरेनियम इत्यादि उपस्थित रहता है  | खनिज ईंधन कहलाता है |

         प्रमुख धात्विक व अधात्विक खनिज

                          लौह अयस्क

 पृथ्वी के गर्भ से निकाली  वैसे अयास के जिसमें जिसमें लोहे की मात्रा रहता है लौह अयस्क कहलाती है |

 लोहे के अंश के आधार पर लौह अयस्क को चार वर्गों में विभाजित किया गया है 

               (i)  मैग्नेटाइट अयस्क ( Fe3O4 )

   मैग्नेटाइट अयस्क  लौह अयस्क का सबसे सर्वोत्तम किस्म का लौह अयस्क है | इस में लोहे की मात्रा लगभग 72% होती है | इसमें वाष्प  की मात्रा बहुत कम होती है | इसका रंग काला होता है |

               (ii) हेमेटाइट अयस्क  ( Fe2O2 )

 हेमेटाइट अयस्क भी लौह अयस्क का  महत्वपूर्ण अयस्क है | जिसमें लोहे की मात्रा 70% होती है |

                 (iii) लिमोनाइट  ( 3Fe2 O2 3H2O )

 लिमोनाइट अयस्क में धातु का अंश  60% रहता है | इसका रंग पीला होता है |

                 (iv)  सीडेराइट  (FeCO2 ) 

सीडेराइट  लौह अयस्क में सबसे निम्न कोटि का अयस्क है जिसमें लोहे का अंश 48% होता है |

 विश्व का 90% से भी अधिक लौह अयस्क  सोवियत रूस भारत संयुक्त राज्य अमेरिका ब्राजील दक्षिण अफ्रीका फ्रांस एवं ऑस्ट्रेलिया में संचित है | तथा कुल उत्पादन का 80% से अधिक सोवियत रूस संयुक्त राज्य अमेरिका ब्राजील चीन आस्ट्रेलिया ब्रिटेन भारत फ्रांस और जर्मनी से प्राप्त होता है |

 जापान विश्व का सबसे बड़ा लौह अयस्क आयातक देश है |

 विश्व के सबसे अधिक अयस्क उत्पादक देश प्रथम चीन द्वितीय आस्ट्रेलिया तृतीय ब्राजील चतुर्थ  भारत पंचम रूस तथा भंडारण की दृष्टि से प्रथम स्थान पर ऑस्ट्रेलिया द्वितीय  ब्राजील  तृतीय रूस चतुर्थ चीन , पंचम भारत है |

                              मैंगनीज

 मैंगनीज एक प्रकार का महत्वपूर्ण धात्विक खनिज है |  जिसका प्रयोग मुख्य रूप से  लौह इस्पात एवं  शुष्क बैटरी के निर्माण में किया जाता है | इसके अलावा इसका प्रयोग रासायनिक एवं कांच उद्योग में भी होता है | भारत ब्राजील दक्षिण अफ्रीका  घाना एवं जायरे  मैंगनीज  की प्रमुख निर्यातक देश संयुक्त राज्य अमेरिका मैंगनीज का सर्वाधिक महत्वपूर्ण आयातक देश है |

 मैगनीज उत्पादन में प्रथम स्थान पर चीन दूसरे स्थान पर दक्षिण अफ्रीका है |  जबकि भंडारण की दृष्टि से देखा जाए तो प्रथम स्थान पर दक्षिण अफ्रीका द्वितीय स्थान पर यक्रेन है |

                                तांबा

 तांबा एक प्रकार का महत्वपूर्ण धातु है | जो क्यूप्राइट पायराइट मैलाकाईट एवं कैमकोसाइट  आयस्क के  द्वारा प्राप्त किया जाता है |

 तांबा का प्रथम उत्पादक देश चिली एवं द्वितीय उत्पादक देश चीन है |

                              बॉक्साइट

 बॉक्साइट एलुमिनियम का प्रमुख अयस्क है | जिससे एलुमिनियम प्राप्त किया जाता है | इसके अलावा बायोलाइट कोरंडम एवं कओलिन भी एलुमिनियम प्राप्त किया जाता है | एलुमिनियम हल्की एवं विद्युत का सुचालक होता है | एलुमिनियम को धातुओं से मिलाकर मजबूत मिश्र धातु बनाने के कारण बहुत ही उपयोगी धातु हो गया है |

 बॉक्साइट उत्पादन में प्रथम स्थान पर आस्ट्रेलिया द्वितीय स्थान पर चीन लेकिन भंडारण की दृष्टि से देखा जाए तो प्रथम स्थान पर गिनी और द्वितीय स्थान पर आस्ट्रेलिया है |

    एलुमिनियम उत्पादन में प्रथम स्थान पर चीन द्वितीय स्थान पर रुस है |

                              अभ्रक

 अभ्रक  महत्वपूर्ण अलौह धात्विक खनिज यह ताप एवं विद्युत का कुचालक होता है | जिसके कारण इसका उपयोग मुख्य रूप से बिजली के उपकरण बनाने में होता है | इसके साथ-साथ इसका उपयोग चिमनी चशमा , दावा रंग आदि के निर्माण भी किया जाता है |  इसका रंग उजला हरा एवं काला होता है | जिसमें उजले रंग वाला अभ्रक सर्वश्रेष्ठ माना जाता है |

 भारत अभ्रक का सबसे बड़ा निर्यातक देश है | इसके साथ ही सबसे ज्यादा अभ्रक सीट की उत्पादित करने वाला देशों में भी शामिल है | यह अपने उत्पादन के अधिकांश भाग को निर्यात कर देता है |

 अभ्रक उत्पादन में प्रथम स्थान पर फिनलैंड द्वितीय स्थान पर तुर्की एवं तृतीय स्थान पर अमेरिका |

                               टिन

टिन  कैसिटेराइट (  राँगा पत्थर ) से प्राप्त किया जाता है |

 चीन टिन का सबसे बड़ा उत्पादक देश है | जबकि द्वितीय स्थान पर  म्यांमार तृतीय स्थान पर पेरू |

                               सोना

 सोना सबसे महत्वपूर्ण अलौह  धात्विक खनिज जिसका उपयोग मुख्य रूप से जेवर के निर्माण में होता है | सोना तुलनात्मक रूप से शुद्ध रूप में चट्टानों की नसों में एवं प्लेसर के रूप में पाया जाता है |  शुद्ध सोना 22 कैरेट का होता है | सोना उत्पादन में चीव प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया जबकि दूसरे स्थान ऑस्ट्रेलिया का आता है | विश्व में सोने का सर्वाधिक संचित भंडार दक्षिण अफ्रीका में है | जोहान्सबर्ग सोना के लिए विश्व प्रसिद्ध है |

                               सीसा

       गैलेना सीसा का महत्वपूर्ण अयस्क है  | जो  जो मुख्य रूप से चूना पत्थर एवं अन्य परतदार चट्टानों में पाया जाता है | विश्व में शीशे का सर्वाधिक भंडारण ऑस्ट्रेलिया में है | जबकि उत्पादन चीन में प्रथम स्थान पर है |

                                जस्ता

    जस्ता अलौह  धात्विक खनिज है खनिज है |  जस्ता जिंक ब्लेड एवं कैलेमाइन अयस्क से निकाला जाता है | जस्ते के भंडारण में ऑस्ट्रेलिया प्रथम स्थान पर है | जबकि उत्पादन में चीन प्रथम स्थान पर है |

                                  निकिल

 निकिल एक प्रकार का  लाैह धात्विक खनिज है | निकिल  अधिकांश उपयोग मैंगनीज एवं क्रोमियम धातु के साथ मिलाकर इस्पात के निर्माण में किया जाता है | इसके अलावा इसका उपयोग भारी यंत्र वायुयान निर्माण एवं मोटर उद्योगों में मजबूत इस्पात के निर्माण के लिए इसका प्रयोग किया जाता है | निकिल का सर्वाधिक उत्पादन फिलीपीन्स देश में होता है |

                              टंगस्टन

 टंगस्टन एक प्रकार का लौह धात्विक खनिज है | यह एक कठोर धातु है | जो उच्च तापमान पर भी जल्दी नहीं पिघलती है | टंगस्टन का उपयोग अधिकतर उच्च वेग वाले एवं उच्च तापमान पर भी  अधिक समय तक धार को यथावत रखने वाले औजारों के निर्माण में किया जाता है | जेट इंजन के निर्माण में एवं बल्ब के तंतु के निर्माण में इसका सर्वाधिक उपयोग किया जाता है | टंगस्टन के उत्पादन में चीन पहले स्थान पर है |

                ऊर्जा संसाधन 

 विश्व में किसी भी देश के आर्थिक विकास और व्यक्तिगत जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए संसाधन आवश्यक है विश्व में ऊर्जा एवं शक्ति के संसाधनों का वितरण बहुत ही असंतुलित है |

 ऊर्जा संसाधनों को कई आधारों पर वर्गीकृत किया गया है 

 इस्तेमाल के आधार पर उर्जा को दो भागों में बांटा गया है

                  (1) नवीकरणीय   ऊर्जा संसाधन 

                   (2) अनवीकरणीय ऊर्जा संसाधन 

             (1) नवीकरणीय   ऊर्जा संसाधन 

 ऊर्जा का वैसे संसाधन जिसका प्रयोग एक बार करने के बाद पुनः उसे प्रयोग में लाया जा सकता है नवीकरणीय   ऊर्जा संसाधन  कहलाता है | नवीकरणीय   ऊर्जा संसाधन  से प्रदूषण जैसी समस्या नहीं के बराबर उत्पन्न होती है | वर्तमान समय में ऊर्जा की बढ़ती मांग एवं पर्यावरण प्रदूषण ग्लोबल  वार्मिंग जैसे समस्या के समाधान हेतु ऐसे वैकल्पिक ऊर्जा संसाधन का विशेष महत्व हो गया है | इसके अंतर्गत पवन ऊर्जा ऊर्जा भूतापीय ऊर्जा सौर ऊर्जा ज्वारीय ऊर्जा आदि शामिल है |

                            जल विद्युत

 जल विद्युत एक नवीकरणीय ऊर्जा संसाधन है इसे श्वेत कोयला भी कहा जाता है क्योंकि जलविद्युत के कारण पर्यावरण प्रदूषण नहीं होता है | अफ्रीका में विश्व की सर्वाधिक संभावित जल विद्युत क्षमता होने के बावजूद उसका विकास बहुत कम हुआ है वहां उपयुक्त प्रौद्योगिकी वित्त एवं विद्युत शक्ति की मांग का अभाव है | अफ्रीका की कांगो नदी की संभावित जल शक्ति क्षमता विश्व की नदियों से अधिक है |  चीन  विश्व का सबसे बड़ा जल विद्युत उत्पादक देश है | चीन  विश्व की 8% एवं एशिया की 34% जल विद्युत उत्पादन करता है |

 किसी भी स्थान पर जल विद्युत उत्पादन के लिए निम्न आवश्यक दर्शाए उपलब्ध होनी चाहिए

  जल विधुत उत्पादन के लिए  जल का वेग एवं आयतन अधिक होनी चाहिए 

जल विधुत उत्पादन के लिए जल ऊंचाई से गिरनी चाहिए 

जल उत्पादन के बाद विधुत की खपत के लिए  बाजार मांग क्षेत्र की समीपता होनी 

इसके लिए परिवहन की साधनो की उपलब्धता होनी चाहिए 

इसके लिए सदावाहिनी नदियां होनी चाहिए 

जल विधुत उत्पादन के लिए तीव्र ढाल होनी चाहिए 

जल विधुत उत्पादन के लिए पूंजी की उपलब्धता होनी चाहिए 

                            पवन ऊर्जा

 पवन ऊर्जा ऊर्जा का नवीकरणीय संसाधन है | एक अनुमान के मुताबिक अगर  पवन ऊर्जा का सही उपयोग किया जाए तो अभी विश्व में उत्पादित हो रही बिजली से 13 गुना अधिक बिजली का उत्पादन किया जा सकता है | सर्वप्रथम पवन ऊर्जा का उत्पादन नीदरलैंड में किया गया था | वर्तमान समय में संयुक्त राज्य अमेरिका पवन ऊर्जा का सबसे बड़ा उत्पादक देश है | संयुक्त राज्य अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य में देश के 90% से अधिक पवन ऊर्जा फार्म लगे पवन ऊर्जा उत्पादन में भारत पांचवा स्थान इसका विकास उन स्थानों पर होता   है जिस  स्थानों में आपपरिवर्ती एवं मध्यम हवा  हमेशा चलती रहती है | पवन ऊर्जा को शांत समय में  संचित नहीं रखा जा सकता है |

                             सौर ऊर्जा

 सौर ऊर्जा नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत का सर्वाधिक व्यापक एवं अपरिमित स्रोत है | सूर्य  से प्राप्त होने वाली सौर ऊर्जा को सौर सेलो में विधुत उत्पन्न करने के लिए उपयोग की जाती है | इसके लिए कई सेलों को सौर पैनलो से प्रकाश व तापमान के लिए शक्ति उत्पन्न करने के लिए जोड़ा जाता है |

                            भू - तापीय ऊर्जा 

 भूतापीय ऊर्जा भी  नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है जो निश्चित स्थान अथवा शैल संरचना के आधार पर नियत  ऊर्जा स्रोत है | इसका संचालन खर्चीला है एवं ऊर्जा का समूप्रयोजन इच्छा अनुसार नहीं किया जा सकता है |

                            ज्वारीय ऊर्जा 

 जब समुद्र में ज्वार उत्पन्न होती है और इससे जो ऊर्जा प्राप्त किया जाता है उस उर्जा को ज्वारीय ऊर्जा कहा जाता है | ज्वारीय ऊर्जा का उत्पादन मुख्य रूप से फ्रांस रूस और भारत में किया जाता है | विश्व का पहला ज्वारीय  स्टेशन फ्रांस में बनाया गया है |

                             जैव ऊर्जा 

 जैव ऊर्जा  के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के पौधों अथवा कार्बनिक पदार्थों से ऊर्जा प्राप्त करते हैं | विभिन्न पौधों से इथेनॉल का उत्पादन करके उसका उपयोग डीजल नैप्था तथा गैसोलीन के विकल्प के रूप में किया जा सकता है | जैव ऊर्जा का उत्पादन अधिकतर विकासशील देशों में किया जा रहा है |

           (2) अनवीकरणीय ऊर्जा संसाधन 

 ऊर्जा  का वैसे स्रोत जिसका एक बार उपयोग करने के बाद पुनः उपयोग में नहीं लाया जा सकता है अनवीकरणीय ऊर्जा संसाधन कहलाता है |

 जैसे कोयला पेट्रोलियम प्राकृतिक गैस प्रमुख है |

                               कोयला 

कोयला अनवीकरणीय ऊर्जा संसाधन है |   या परतदार चट्टानों में पाया जाता है | कोयले का निर्माण मुख्यत: कार्बोनिफेरस युग में हुआ | इसके  अलावा कुछ कोयले का निर्माण टर्शियरी युग में भी हुआ | औद्योगिक क्रांति के आधार होने के कारण कोयले को उद्योग धंधों की जननी भी कहा जाता है |

 कोयला में उपलब्ध कार्बन की मात्रा के आधार पर कोयला को 4 वर्गों में विभाजित किया गया है |

                      (i)   एन्थ्रासाइट कोयला

 एन्थ्रासाइट कोयला  सर्वाधिक उत्तम कोयला है | यह कोयला कठोर एवं चमकदार  इसमे कार्बन की मात्रा लगभग 90% तक होती है | जब इस कोयले को जलाया जाता है | तो कम घुआँ देता है तथा जल जाने के बाद राख की मात्रा काफी कम होती है |

                      (ii)  बिटुमिनस  कोयला

 वैसे कोयला जिसमें कार्बन की मात्रा 70 प्रतिशत से 80% तक रहता है बिटुमिनस कोयला कहलाता है | इसको जलाने  पर अधिक धुआँ देती है  और रखा भी अधिक  बचती है |

                         इस कोयले को गर्म करने के बाद इससे तारकोल निकलता है | इसलिए इस कोयले को बिटुमिनस  कोयला कहा जाता है | विश्व में पाए जाने वाला अधिकांश कोयला इसी प्रकार का इसका उपयोग मुख्यतः कोक  कोयले के निर्माण में होता है |

                   (iii) लिग्नाइट या भूरा कोयला 

वैसे कोयला जिसमे  कार्बन की मात्रा  45% से  70% तक होता है | लिग्नाइट या भूरा  कोयला कहलाता  है |

                   (iv) पिट कोयला 

 पीट कोयला सबसे निम्न किस्म का कोयला है इसमें  आर्द्रता की  मात्रा काफी अधिक होता है |

                     पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस

 ऐसा माना जाता है कि पेट्रोलियम की उत्पत्ति वनस्पतियों समुद्री जीवो  एवं जानवरों की अपघटन  से हुई है | जो लगभग 10 से 20 करोड़  वर्ष पहले अवसादो के नीचे दब गए थे और अपघटन क्रिया के फलस्वरूप पेट्रोलियम का निर्माण हुआ पेट्रोलियम अधिकांशत: अवसादी चट्टानों के गुंबदाकार संरचना क्षेत्र में पाया जाता है |

 प्रति इकाई भार में कोयले की तुलना में अधिक ऊर्जा प्रदान करने की क्षमता होने के कारण या ऊर्जा का महत्वपूर्ण स्रोत है | यह जल और प्राकृतिक गैस के साथ मिला हुआ ऊपर की ओर मुड़ी हुई अपनतियों , परतदार चट्टानों में मिलता है |  इसे निकालने के लिए कुएं या तेल कुप खोदना पड़ता है | चुकी यह जल की अपेक्षा हल्का होता है | अत: सबसे ऊपरी भाग में गैस उसके बाद तेल तथा सबसे नीचे जल रहता है |

                            आण्विक शक्ति

आण्विक शक्ति  ऊर्जा के प्रमुख स्रोत है इसमें ऊर्जा यूरेनियम तथा थोरियम से प्राप्त किया जाता है | 1 किलोग्राम यूरेनियम में 27000 टन कोयले के बराबर ऊर्जा पैदा करने की क्षमता होती है |

विश्व में 11% ऊर्जा परमाणु संसाधनों से प्राप्त होती है |

 यूरेनियम उत्पादन में प्रथम देश कजाकिस्तान  द्वितीय  देश कनाडा और तृतीय देश  आस्ट्रेलिया है |

 परमाणु ऊर्जा उत्पादन में प्रथम देश अमेरिका द्वितीय देश फ़्रांस तृतीय देश  रूस तथा चतुर्थ देश दक्षिण कोरिया है |



रविवार, 4 जुलाई 2021

फसल किसे कहते हैं विभिन्न प्रकार के फसलों के बारे में वर्णन करें

          फसल क्या है

   भोजन प्राप्ति के लिए जब एक ही प्रकार के पौधों को किस स्थान पर बड़े पैमाने पर उगाया जाता है | तब उसे फसल कहा जाता है |

      फसल कई प्रकार के होते हैं

          खाद्यान्न फसले 

          नगदी फसलें 

          पेय फसले 

          रेशेदार फसले 

          तिलहन फसले 

          अन्य फसले 

               विश्व की प्रमुख खाद्यान्न फसलें

                                 गेहूं





 गेहूं फसलें  विश्व में सर्वाधिक क्षेत्रफल पर बोई जाने वाली फसल है | विश्व में सिंचाई का सबसे अधिक उपयोग गेहूं की खेती के लिए ही होता है या मुख्यता शीतोष्ण कटिबंधीय फसल  है | लेकिन इसे उष्ण एवं उपोष्ण कटिबंध क्षेत्रों में भी पैदा किया जाता है |

          गेहूं के लिए आदर्श भौगोलिक परिस्थितियां

   *  गेहूं को बोते समय तापमान 10°  C  डिग्री सेल्सियस  बढ़ते समय 15° C  एवं  पकते  समय  20° C  होना चाहिए

 * इसके लिए  वर्षा 50 से 80 सेमी होनी चाहिए

 * गेहूं के लिए मिट्टी नरम मटियार भारी  दोमट या उपजाऊ काली  मिट्टी होनी चाहिए

 * जल निकासी की सुविधा  और पकते समय तेज धुप  होनी चाहिए

          ऋतु के आधार पर गेहूं को दो वर्गों में बांटा गया है

                         शीतकालीन गेहूं

 यह  गेहुं शीत ऋतु नवंबर  एवं दिसंबर में बोया जाता है और ग्रीष्म ऋतु मार्च-अप्रैल  मे काट लिया जाता है | या मुख्य रूप से मध्य एवं निम्न अक्षांशो  में उपजाया जाता है | विश्व के कुल उत्पादन का 80%  गेंहूं शीतकालीन होता है |

                         बसंतकालीन गेहूं

 शीतोष्ण कटिबंध के उन भागों में बसंतकालीन गेहूं उगाया जाता है | जहां शीत ऋतु में अत्यधिक ठंड पड़ती है | वहां  गेहूं वसंत ऋतु में उगाया जाता है | यह अपेक्षाकृत कम समय में तैयार होता है |  विश्व के कुल उत्पादन का मात्र 20% गेहूं बसंतकालीन होता है |

                             चावल

 चावल एक प्रकार का उष्णकटिबंधीय फसल है | इसकी कृषि मुख्य रूप से उष्ण एवं उपोष्ण कटिबंधीय  क्षेत्रों में की जाती है | पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर ऐसा माना जाता है | कि चावल की कृषि सबसे पहले चीन में प्रारंभ हुआ इसके बाद इसका विस्तार से दक्षिणी और पूर्वी एशियाई भागों में हुआ |





           चावल के लिए आदर्श भौगोलिक परिस्थितियां

 चावल की खेती के लिए मुख्य रूप से तापमान लगभग 24° C से 27° C  चाहिए |

 वार्षिक वर्षा 125 से 200 सेमी होना चाहिए | यह वर्षा  नियमित रूप से होनी चाहिए |  ताकि खेतों में जल भरा रहे लेकिन या जल बंधा हुआ ठहरा हुआ नहीं होना चाहिए |

    इसके लिए मिट्टी उपजाऊ  दोमट मिट्टी या जलोढ़  मिट्टी होनी चाहिए |

 मानसूनी प्रदेश की जलवायु चावल की खेती के लिए विशेष रूप से उपयुक्त मानी जाती है |

                               मक्का

 गेहूं एवं चावल के बाद मक्का तीसरी महत्वपूर्ण फसल है विकसित देशों में इस फसल का प्रयोग पशु चारे के लिए होता है | जबकि अविकसित देशों में यह लोगों की जीविका का  स्रोत है | ऐसा माना जाता है | कि मक्का का जन्म मध्य अमेरिका में हुआ था जहां ग्रीष्म ऋतु गर्म आर्द्र होती है | वहां मक्का का उत्पादन सर्वोत्तम होता है |  विश्व के मक्का उत्पादन का लगभग 50% उत्पादन संयुक्त राज्य अमेरिका में होता है |






   मक्का उत्पादन के लिए आदर्श भौगोलिक परिस्थितियाँ

 मक्का उत्पादन के लिए तापमान 18°C से 27°C होना चाहिए |

 इसके लिए वर्षा 50 सेमी से 125 सेमी होना चाहिए लेकिन जल का जमाव हानिकारक होता है |

 मक्का के लिए मिट्टी चिकनी , दोमट मिट्टी होनी चाहिए |

                             जई

 जई  एक प्रकार का खाद्य फसल है इसका सर्वाधिक उत्पादन यूरेशिया के गेहूं क्षेत्र के उत्तर में पाया जाता है इसका दूसरा उत्पादक क्षेत्र उत्तरी अमेरिका में  गेहूं  की पेटी के पूर्व में स्थित है






                 आदर्श भौगोलिक परिस्थितियां

    जई  कृषि के लिए सभी भौतिक परिस्थितियां आवश्यक होती है | जो गेहूं की कृषि के लिए आवश्यक होती है | लेकिन तुलनात्मक रूप से अधिक जल की आवश्यकता होती है |

                              जौ 

 यह भी एक प्रकार की खाद्य फसलों है | जो अन्य फसलों की तुलना में यह कम समय में तैयार हो जाता है | इसका उपयोग भोजन के अलावा बीयर एवं शराब के निर्माण में भी होता है |





               विश्व की प्रमुख पेय फसलें

                                चाय

 चाय एक प्रकार का पेय फसल है  | यह उष्णकटिबंधीय बागानी फसल है  ऐसा माना गया है | कि इसका सर्वप्रथम जन्म चीन में हुआ चाय  कि कृषि मानसूनी जलवायु वाले देशों में सबसे अधिक की जाती है |





                    चाय का उत्पादक क्षेत्र

 चीन -  चाय की कृषि चीन में ही शुरू हुई और आज भी सबसे अधिक क्षेत्र में चाय की कृषि  चीन में ही उपजाई जाती है | चीन की चाय निम्न स्तर की होती है | एवं उत्पादन घरेलू खपत के लिए होता है |

भारत -  भारत में असम में ब्रह्मपुत्र एवं सुरमा घाटी तथा सदिया क्षेत्र पश्चिम बंगाल में दार्जिलिंग एवं जलपाईगुड़ी बिहार में पूर्णिया झारखंड में रांची उत्तराखंड में देहरादून , अल्मोड़ा में गढ़वाल , हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा घाटी एवं दक्षिण भारत में नीलगिरी पहाड़ी क्षेत्र भारत के प्रमुख चाय उत्पादक क्षेत्र है 

 भारत श्रीलंका इंडोनेशिया बांग्लादेश जापान  कीनिया एवं ताइवान चाय की प्रमुख निर्यातक देश है | भारत अपनी कुल उत्पादन का लगभग एक चौथाई चाय निर्यात करता है | यह निर्यात मुख्यतः कोलकाता बंदरगाह से किया जाता है |

   चाय  के उत्पादन के लिए आदर्श भौगोलिक परिस्थितियां

चाय  की खेती के लिए तापमान 21°C से 29°C होना चाहिए |

 इसके लिए वर्षा 150 से 200 सेमी होनी चाहिए ( जलवायु ठंडी एवं आद्र होनी चाहिए ) |

 इसके लिए मिट्टी गहरी एवं उपजाऊ दोमट मिट्टी होनी चाहिए | जिसमें फास्फोरस एवं लोहा की उपलब्धता पर्याप्त मात्रा में हो |

 इसकी पत्तियां साल में कई बार तोड़ी जाती है | जैसे चीन में 3 बार एवं भारत में 16 बार तोड़ जाती है | जिसके लिए बड़ी मात्रा में सस्ते श्रमिक की आवश्यकता होती है |

 इसके लिए  मंद ढालू भूमि होनी चाहिए |

                     चाय दो प्रकार की होती है |

                            काली चाय

 काली चाय टैनिक अम्ल की मात्रा उच्च होती है | इसका उत्पादन श्रीलंका इंडोनेशिया भारत आदि देशों में होता है |

                       हरी चाय ( ग्रीन टी )

 यह चाय काली चाय की तुलना में उत्तम होती है | और इसका उत्पादन मुख्य रूप से जापान एवं चीन में किया जाता है | चाय की प्रति व्यक्ति सर्वाधिक खपत ब्रिटेन एवं रूस में है |

                     कहवा ( कॉफी )

 कहवा की कृषि एवं व्यापार पहली बार अरब प्रायद्वीप  में किया गया एवं वहां से इसे ब्राजील लाया गया | विश्व में ब्राजील सबसे अधिक कहवा उत्पादन करता है | इसके बाद वियतनाम और तीसरे स्थान पर इंडोनेशिया का स्थान आता है |





       कहवा के लिए आदर्श भौगोलिक परिस्थितियां

 कहवा उष्ण  जलवायु की फसल है  जो समुद्र तल से 500 से 1500 मीटर की ऊंचाई पर उगाई जाती है |

 कहवा उत्पादन के लिए तापमान 15°C से 25°C होना चाहिए |

  इसके लिए वर्षा 115 से 200 सेमी वर्षा समान रूप से वितरित होनी चाहिए |

 कहवा के लिए मिट्टी उपजाऊ जिसमें लोहा , नाइट्रोजन एवं ह्यूमस   पर्याप्त मात्रा में होनी चाहिए | वनीय  मिट्टी विशेष रूप से उपयुक्त मानी जाती है |

  तेज हवा एवं सीधी धूप  कहवा फसल के लिए हानिकारक होती है | अतः इसके पौधों को छाया में उगाया जाता है | छाया के लिए मकई  केला  आदि की फसलें उसके बगल में लगा दी जाती है |

  पाला  कहवा की फसल के लिए हानिकारक होता है  | इसके लिए चाय की अपेक्षा अधिक उपजाऊ एवं ढालू भूमि होनी चाहिए | ताकि जल का प्रवाह सुगमता से हो सके |

                   विश्व की नगदी फसलें

 वैसी फसलें जिसको बेचकर  जल्द नगद प्राप्त किया जा सकता है | नकदी फसल कहलाता है |

                        प्रमुख नकदी फसल

                                 रबड़

 रबड़ एक उष्णकटिबंधीय पौधा है इसका जन्म स्थान अमेजन नदी की घाटी है |




     रबड़ उत्पादन के लिए आदर्श भौगोलिक परिस्थितियां

 रबड़ उत्पादन के लिए तापमान लगभग 27°C से 21°C से कम तापमान हानिकारक होता है |

 इसके उत्पादन के लिए 200 सेमी  से अधिक वर्षा होनी चाहिए लेकिन  सुवितरित होनी चाहिए |

                        उत्पादक क्षेत्र

 बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में अमेजन बेसिन एवं जायरे बेसिन मिलकर विश्व का 99% प्राकृतिक रबड़ का उत्पादन करते थे | लेकिन वर्ष 1950 तक इसका योगदान घटकर मात्र 2% हो गया वर्तमान समय में विश्व के कुल उत्पादन का 90% भाग दक्षिण पूर्वी एशिया से प्राप्त होता है |  रबड़ की कृषि अधिकतर तटीय मैदानों एवं पठारो के ढालों पर की जाती है |

 दक्षिण पूर्वी एशिया में थाईलैंड इंडोनेशिया एवं मलेशिया रबड़ के प्रमुख उत्पादक देश है |

                              गन्ना

 गन्ना उष्ण  एवं उपोष्ण जलवायु की फसल  विश्व के कुल चीनी उत्पादन का दो तिहाई गन्ने से प्राप्त होता है |





           गन्ने के लिए आदर्श भौगोलिक परिस्थितियां

   गन्ना उत्पादन के लिए तापमान 21°C से 27°C के बीच होनी चाहिए |

 इसके लिए वर्षा 150 सेमी होनी चाहिए |

 जलवायु पर्याप्त धूप काटने के समय शुष्क मौसम |

 मिट्टी उपजाऊ दोमट या हल्की चिकनी मिट्टी होनी चाहिए जिसमें जल बहाव का समुचित प्रबंध हो एवं जलोढ़ मिट्टी में गन्ने की अच्छी फसल होती है | 

                         उत्पादक क्षेत्र

 भारत में गन्ने की कृषि मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश तमिलनाडु कर्नाटक  महाराष्ट्र आंध्र प्रदेश बिहार आदि राज्यों में की जाती है | भारत गन्ने का प्रमुख उत्पादक होने के बावजूद भारत में प्रति हेक्टेयर गन्ने की उपज काफी कम है | यहां के गन्ने में  सुक्रोज की मात्रा भी काफी कम होती है | विश्व में गन्ना उत्पादन में प्रथम ब्राजील द्वितीय भारत  तथा तृतीय चीन है |

 गन्ने का विश्व व्यापार नहीं होता है | बल्कि इससे चीनी तैयार करके उसका व्यापार किया जाता है |   चीनी निर्यात करने वाले देशों में सबसे प्रथम स्थान पर  क्यूबा है जिसके समस्त निर्यात व्यापार का 80% भाग  चीनी ही है |

                               तंबाकू

 तंबाकू उष्ण  एवं उपोष्ण जलवायु की फसल है | इसका जन्म स्थान संयुक्त राज्य अमेरिका माना जाता है |





    तंबाकू उत्पादन के लिए आदर्श भौगोलिक परिस्थितियाँ 

 तंबाकू उत्पादन के लिए तापमान 18°C से 27°C के बीच होनी चाहिए |

 इसके लिए वर्षा 50 से 100  सेंटीमीटर होनी चाहिए |

 तंबाकू उत्पादन के लिए खनिज एवं जीवाश्म से युक्त दोमट मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है |

 तंबाकू उत्पादन में प्रथम स्थान पर चीन द्वितीय स्थान पर भारत एवं तृतीय स्थान पर ब्राजील है |

             विश्व की प्रमुख रेशेदार फसले 

                              कपास

 कपास उष्ण  क्षेत्र की उपज है | लेकिन वर्तमान समय में इसकी सर्वाधिक उपज उपोष्ण क्षेत्र में होता है | इसका जन्म स्थल मिस्त्र  माना जाता है |




 विश्व के सबसे बड़ा कपास उत्पादक देश चीन है | इसके बावजूद भी चीन कपास का निर्यात नहीं करता है | कपास का सबसे बड़ा निर्यातक देश संयुक्त राज्य अमेरिका है | विश्व में कपास के प्रथम उत्पादक देश चीन एवं द्वितीय भारत एवं तृतीय स्थान पर अमेरिका |

   कपास उत्पादन के लिए आदर्श भौगोलिक परिस्थितियां 

    कपास के उत्पादन के लिए तापमान 21 से 27 के बीच होनी चाहिए |

 इसके लिए वर्षा  50 से 100 सेंटीमीटर होनी चाहिए |

   कपास उत्पादन के लिए जलवायु पर्याप्त धूप ताकी रेशे चमकदार एवं मजबूत बन सके |

    कपास उत्पादन के लिए मिट्टी हालकी एवं उपजाऊ मिट्टी होनी चाहिए | जिसमें चुने का पर्याप्त मात्रा उपस्थित होना चाहिए | काली मिट्टी कपास उत्पादन के लिए सर्वाधिक उपयुक्त मानी जाती है |

                                जूट

जुट उष्ण एवं आर्द्र  जलवायु की फसल है | जिसकी कृषि में दक्षिणी एशिया को एकाधिकार प्राप्त है |

    इसका उत्पादन भारत ( पश्चिम बंगाल बिहार असम ओडिशा एवं उत्तर प्रदेश है )  बांग्लादेश एवं चीन मिलकर  विश्व का 95% से अधिक जूट का उत्पादन करता है |

 विश्व मे जूट का प्रथम उत्पादक देश भारत द्वितीय बांग्लादेश एवं तृतीय चीन है |  विश्व में जूट  का सबसे बड़ा निर्यातक देश बांग्लादेश है |





   जूट उत्पादन के लिए आदर्श भौगोलिक परिस्थितियाँ 

 जूट उत्पादन के लिए तापमान 25 डिग्री से अधिक होनी चाहिए |

 जूट उत्पादन के लिए वर्षा 170 सेमी से अधिक होनी चाहिए |

जुट उत्पादन के लिए मिट्टी नवीन जलोढ़ एवं डेल्टाई  उपयुक्त मानी जाती है |

              विश्व की प्रमुख तिलहन फसलें

                            ताड़ - तेल

       ताड़ - तेल  के कृषि के लिए वे सभी  भौगोलिक परिस्थितियां आवश्यक होती है | जो नारियल की कृषि के लिए आवश्यक है ताड़ - तेल  उत्पत्ति स्थल नाइजीरिया को माना जाता है |  लेकिन हाल के वर्षों तक  नाइजीरिया ताड़ - तेल  का सबसे बड़ा उत्पादक था परंतु वर्तमान समय में यह स्थान इंडोनेशिया को प्राप्त है |





 विश्व में ताड़ - तेल का  प्रथम उत्पादक देश इंडोनेशिया द्वितीय मलेशिया तृतीय  नाइजीरिया है |

                           मूँगफली

मूँगफली  उष्ण एवं  उपोष्ण कटिबंध की फसल है | इसका जन्म स्थल  ब्राजील माना जाता है | इसी कृषि  मुख्य रूप से  भारत चीन एवं नाइजीरिया में की जाती है |





             विश्व में मूंगफली का सबसे बड़ा उत्पादक देश चीन द्वितीय भारत एवं तृतीय अमेरिका है |

                          सोयाबीन 

 सोयाबीन की कृषि उपोष्ण जलवायु से लेकर शीतोष्ण कटिबंधीय जलवायु में की जाती है |




 विश्व में  सोयाबीन का प्रथम उत्पादक देश अमेरिका द्वितीय ब्राज़ील एवं तृतीय अर्जेंटीना है |

                               अलसी

 अलसी  फ्लैक्स के पौधे से प्राप्त किया जाता है | उष्ण एवं उपोष्ण जलवायु में  फ्लैक्स  की कृषि बीज के लिए की जाती है | जिससे तेल निकाला जाता है | जब की शीत शीतोष्ण जलवायु में फ्लैक्स की  कृषि रेशा प्राप्ति के लिए की जाती है |





 विश्व में अलसी का प्रथम उत्पादक देश कनाडा द्वितीय चीन एवं तृतीय  रूस है |

                 विश्व की अन्य प्रमुख फसलें

                               कोको 

        कोको एक प्रकार का उष्णकटिबंधीय पौधा है |  इसकी कृषि  विषुवत रेखा के दोनों ओर 20 डिग्री अक्षांश के बीच की जाती है |




           इसकी खेती के लिए औसत तापमान 27 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए तथा वर्षा 200 सेमी से अधिक होनी चाहिए | कोको उत्पादन के लिए मिट्टी गहरी एवं उपजाऊ होनी चाहिए जिसमें लोहा एवं पोटाश पर्याप्त मात्रा में उपस्थित हो |

                         चुकंदर

 चुकंदर शीतोष्ण जलवायु की फसल है | एवं इसकी कृषि मुख्य रूप से यूरोप में की जाती है |




 चुकंदर की खेती के लिए औसत तापमान 16°C से 24°C  के बीच होनी चाहिए | इसकी खेती के लिए नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों की अधिक मात्रा उपस्थित होनी चाहिए |

 चुकंदर से चीनी भी उत्पादन किया जा सकता है | चुकंदर से उत्पन्न चीनी की लागत  गन्ना से प्राप्त चीनी की अपेक्षा अधिक होती है |

     चुकंदर उत्पादन में  रूस प्रथम स्थान पर तथा द्वितीय स्थान पर  फ्रांस एवं तृतीय स्थान पर अमेरिका है |

                            नारियल

 नारियल की खेती के लिए तापमान उच्च ( 25 डिग्री सेल्सियस ) अधिक वर्षा ( 200 सेमी )  तथा अधिक आर्द्रता की आवश्यकता होती है | नारियल की  कृषि के लिए समुद्री जल वायु उत्तम मानी जाती है |  इंडोनेशिया , फिलीपीन्स , भारत , फिजी , श्रीलंका ,  मलेशिया एवं मोजाम्बिक नारियल के प्रमुख उत्पादक देश है |





 नारियल उत्पादन में प्रथम स्थान पर इंडोनेशिया द्वितीय स्थान पर फिलीपीन्स  एवं तृतीय स्थान पर भारत है |

                            रेशम

 रेशम एक प्रकार की  कीड़े से प्राप्त किया जाता है | जिसको जीवित रहने के लिए कम से कम 16 डिग्री सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है | यही कारण है कि इसका उत्पादन मुख्य रूप से उष्ण एवं उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में किया जाता है | रेशम की उत्पत्ति सर्वप्रथम चीन से हुई है | विश्व के कुल रेशम उत्पादन का 80% से अधिक भाग पूर्वी एवं दक्षिण पूर्वी एशिया से प्राप्त होता है | जापान चीन कोरिया एवं इटली कच्चे रेशम के महत्वपूर्ण निर्यातक है |जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका भारत फ्रांस जर्मनी आदि देश कच्चे रेशम के आयातक है |




 रेशम उत्पादन में प्रथम स्थान पर चीन द्वितीय स्थान पर भारत एवं तृतीय स्थान पर उज्बेकिस्तान है |









शनिवार, 3 जुलाई 2021

कृषि किसे कहते हैं कृषि के बारे में वर्णन करें

             कृषि क्या है

 कृषि एक प्राथमिक प्रक्रिया है जिसमें फसलों फलों सब्जियों फूलों को उगाया जाता है | के साथ-साथ पशुपालन को भी शामिल किया जाता है | विश्व के लगभग 50% लोग कृषि कार्य से जुड़े हुए है | जिस  भूमि पर कृषि उगाया जाता है | उसे कृषि गत भूमि कहा जाता है |







          कृषि कई प्रकारके होते है

 विश्व में कृषि को भौगोलिक दशाओं  उत्पाद की मांग श्रम और प्रौद्योगिकी के स्तर  पर  तथा सामाजिक आर्थिक व भौतिक कारको के प्रभाव के आधार पर कई प्रणाली में बांटा गया है |

                      स्थानांतरित कृषि

 स्थानांतरित कृषि में सबसे पहले वन के  किसी खंड को साफ करके भी वृक्षों तथा  झाड़ियों को जला दिया जाता है | इसके बाद इस भूमि पर खेती की जाती है | और तब तक की जाती है | जब तक कि इस भूमि की उर्वरा शक्ति समाप्त ना हो जाए इस प्रकार पुन: है यह  प्रक्रिया दूसरी भूमि पर भी की जाती है | इसलिए इसे स्थानांतरित  कृषि कहा जाता है | इसे झूम कृषि भी कहा जाता है |

                        निर्वाहक  कृषि

 वैसे कृषि क्षेत्र है जिसमें खेती करने का मुख्य लक्ष्य परिवार निर्वाह करना होता है निर्वाहक  कृषि कहा जाता है | यह  कृषि उत्पादक की आवश्यकता की पूर्ति तक ही सीमित रहती है | इस प्रकार की कृषि अमेजन नदी घाटी , दक्षिण पूर्वी एशिया , अफ्रीका का  गीनी तट एवं भारत चीन के क्षेत्रों में की जाती है |

                         विस्तृत कृषि

 बड़े आकार वाले खेतों के जोतों पर यांत्रिक विधियों से की जाने वाली  खेती को विस्तृत  कृषि कहा जाता है |

 इस प्रकार की कृषि में श्रमिकों का उपयोग बहुत कम एवं यांत्रिक उपकरणों का इस्तेमाल बहुत अधिक होता है | विस्तृत  कृषि में प्रति व्यक्ति उत्पादन की मात्रा अधिक होती है परंतु प्रति हेक्टेयर उत्पादन कम होता है | किस प्रकार की कृषि प्रेयरी के मैदान तथा आस्ट्रेलिया में   की जाती है |

                         मिश्रित कृषि

 वैसे कृषि जिसमें फसलें उगाने के साथ-साथ पशुओं का भी पालने का कार्य साथ साथ किया जाता है मिश्रित कृषि कहलाता है | यह  मिश्रित बुआई से बिल्कुल भिन्न है  | क्योंकि मिश्रित बुवाई में एक ही खेती पर एक ही समय में कई फसलें उगाई जाती है | जबकि मिश्रित कृषि में फसलें उगाने के साथ-साथ पशुपालन का भी काम किया जाता है |

 इस प्रकार की कृषि अधिकतर बड़े-बड़े नगरों के आसपास की जाती है | जिससे उसके उत्पादन की बिक्री में कोई कठिनाई नहीं होती है | उत्तम कृषि विधियां सुविधाजनक  यातायात  शहरी बाजार के निकटता तथा विश्वासनीय  वर्षा से इस  कृषि को बड़ी सहायता मिलती है |

                     व्यापारिक रोपण कृषि

  यह एक प्रकार का नवीन प्रणाली है इस प्रकार की कृषि को आर्थिक तथा सामाजिक शोषण के लिए कम विकसित समाज में शुरू किया गया है | इस प्रकार की कृषि व्यवस्था में अनेक उपजे जैसे -चाय काहवा नारियल , गन्ना , केला , मसाले , कोको , रबड़ , कपास  आदि बागानों में व्यापारिक दृष्टि से उत्पादन की जाती है | इस कृषि का विकास एवं प्रोत्साहन समशीतोष्ण कटिबंधीय देशों को निर्यात करने के उद्देश्य से अनेक उष्णकटिबंधीय देशों में उपनिवेशवाद के दौरान किया गया था | चाय , कपास एवं तंबाकू जैसी फसलें उपोष्ण कटिबंधीय देशों में भी उपजाई जाती है | इन क्षेत्रों में प्रारंभिक कृषि विकास में पूंजी यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका द्वारा लगाई गई थी | इसमें केवल अकुशल श्रमिक स्थानीय होते हैं | जबकि प्रशासनिक एवं कुशल श्रमिक ,  कृषि यंत्र , रासायनिक उर्वरक , कीटनाशक दवा ,  श्रमिकों की आवश्यक सामग्री औद्योगिक कल कारखाने एवं मशीनों के पुर्जे यातायात के साधन आदि समशीतोष्ण देशों से ही मंगाए जाते हैं | इसलिए रोपण कृषि को समांतर संस्था भी कहा जाता है |

            व्यापारिक खाद्यान्न उत्पादन कृषि

 व्यापारिक खाद्यान्न उत्पादन  कृषि व्यवस्था तकनीकी विकास की देन है | इस प्रकार की कृषि व्यवस्था  मध्य अक्षांशीय आर्द्र  एवं शुष्क प्रदेशों के मध्य  विस्तृत  घास मैदानों में मिलती है | जहां की मृदा वनस्पति तथा हिमयुग के निक्षेपण  के कारण अधिक  उर्वर है |

 विश्व में इस प्रकार के कृषि क्षेत्र संयुक्त राज्य अमेरिका एवं कनाडा के प्रेयरी प्रदेश अर्जेंटीना के पंपास ऑस्ट्रेलिया एवं रूस के स्टेपी  भागों में पाए जाते हैं |

 यह कृषि विस्तृत क्षेत्रों पर की जाती है | कृषि में यंत्रीकरण का अधिक उपयोग होता है | इसमें अत्यधिक बड़े-बड़े फार्म पर खेती की जाती है | इसमें पूंजी का अधिकतम निवेश होता है |

                   भूमध्यसागरीय कृषि

 भूमध्यसागरीय जलवायु वाले प्रदेशों में की  जाने वाले कृषि को भूमध्यसागरीय कृषि कहा जाता है | यहां की जलवायु की विशेषता है  कि यहां सर्दियों में वर्षा होती है | और  ग्रीष्म ऋतु में सूखा रहता है | इसलिए यहां  ग्रीष्म एवं  शीत ऋतु में  भिन्न भिन्न  फसलों की खेती की जाती है |

                           गहन कृषि

 बहुत कम क्षेत्र में श्रम गहन तथा यांत्रिक विधियों द्वारा अधिक मात्रा में उपजाई जाने वाली फसल को गहन  कृषि कहा जाता है | इसमें एक निश्चित समय अवधि में अधिकाधिक फसलों का उत्पादन किया जाता है | जनसंख्या की अधिक घनत्व वाले क्षेत्रों भूमि की कम उपलब्धता वाले क्षेत्रों में रासायनिक उर्वरकों , उन्नत बीज व कीटनाशक दवाइयों , सिंचाई , फसल चक्र आदि के प्रयोग से इस प्रकार की खेती  की जाती है |

             व्यापारिक दुग्ध पशुपालन कृषि 

 इस प्रकार की कृषि का मुख्य उद्देश्य दूध एवं दूध से उत्पन्न पदार्थों का व्यापारिक उत्पादन करना होता है  | फलोत्पादन कृषि की अपेक्षा इस व्यवस्था में अधिक श्रम पूंजी कृषि एवं मशीनों तथा सजगता की नितांत आवश्यकता पड़ती है | यह  उद्योग उन्हीं भागों में सफल है जहां शहरी बाजारों की निकटता के कारण दूध ,  क्रीम , मक्खन , पनीर तथा मांस की मांग  है |  साथ ही साथ परिवहन के साधन भी सुलभ हो | इस प्रकार की  कृषि का प्रसार विशेष रूप से बड़े पैमाने पर समशीतोष्ण जलवायु प्रदेशों में है | उष्ण प्रदेशों में विशेषकर शहरी केंद्रों के  निकट मुख्यत: दुग्ध  पशुपालन कार्य संपन्न किया जाता है  |

                      कृषि के विशेष प्रकार

 विश्व के वर्तमान कृषि व्यवस्था में बड़े पैमाने की विभिन्न कृषि  पद्धति के अतिरिक्त कुछ विशेष प्रकार की कृषि प्रचलित है जो निम्न है

                                  विटीकल्चर 

 इसमें अंगूरों का व्यापारी का स्तर पर उत्पादन होता है |

                  पीसीकल्चर अथवा जल कृषि  

इसमें व्यापारिक स्तर पर किए जाने वाली मछली पालन है |

                               सेरीकल्चर 

 इसमें रेशम उत्पादन की क्रिया जिसमें शहतूत आदि की कृषि भी सम्मिलित है |

                               हॉर्टिकल्चर

 इस कृषि व्यवस्था में व्यापारिक स्तर पर विभिन्न प्रकार के फलों का उत्पादन किया जाता है |

                           आरबरीकल्चर

  इसमें विशेष प्रकार के वृक्षों तथा झाड़ियों की  कृषि जिसमें उनका संरक्षण तथा संवर्धन भी शामिल है |

                             एपीकल्चर 

इस प्रकार की कृषि में व्यापारिक स्तर पर शहद उत्पादन हेतु किए जाने वाला मधुमक्खी पालन का कार्य किया जाता है |

                            फ्लोरीकल्चर 

इस प्रकार की कृषि व्यवस्था में व्यापारिक स्तर पर की जाने वाली फूलों की  कृषि है |

                             सिल्वीकल्चर  

इसमें  वृक्षों तथा वनों के संरक्षण से संबंधित कार्य  किया जाता है |

                             वेजीकल्चर 

 दक्षिण पूर्वी एशिया में आदि मानव द्वारा सर्वप्रथम की गई वृक्षों की कृषि आदिम  कृषि के नाम से जानी  जाती हैं |

                           नेमॉरीकल्चर 

 यदि एक प्रकार का आदिम व्यवस्था की कृषि है जिसमें मानव द्वारा जंगलों से फल जड़ आदि का संग्रह किया जाता था |

                              ओलेरीकल्चर

 इस प्रकार की कृषि व्यवस्था में जमीन पर फैलने वाली सब्जियों की व्यापारिक कृषि इसके अंतर्गत आती है |

                              मेरीकल्चर 

इसमें व्यापारिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु समुद्री जीवो के उत्पादन की क्रिया संपन्न की जाती है |

                    हॉर्सीकल्चर अथवा अश्व पालन 

 सवारी एवं यातायात के लिए उन्नत प्रजाति के  घोड़ों एवं खच्चरो को व्यापारी स्तर पर  पालने की क्रिया

शुक्रवार, 2 जुलाई 2021

मृदा किसे कहते है ,लाल मिटटी क्या है ,क्षारीय मृदा किसे कहते है,काली मिटटी किसे कहते है ,जलोढ़ मिटटी किसे कहते है , लैटेराइट मिटटी किसे कहते है

              मृदा क्या है





        वैसे प्राकृतिक तत्व जो खनिज एवं जैविक पदार्थों से निर्मित होती  है | मृदा कहलाती है | अर्थात चट्टानों के विघटन के फलस्वरूप तथा अपसरण से निर्मित असंगठित सूक्ष्म पदार्थ  जिसमें ह्यूमस  के रूप में कार्बनिक पदार्थ उपस्थित रहते हैं   | सामूहिक रुप से  मृदा कहलाती है |

                 मृदा का महत्व

 मृदा जीवमंडल में ऊर्जा तथा पोषक तत्वों के स्थानांतरण के माध्यम के रूप में कार्य करती है | तथा पदार्थों के जैविक संघटको के द्वारा गमन , चक्रण एवं पुनर्चक्रण में सहायता करती है | इसके अलावा मृदा विभिन्न प्रजातियों के पौधों तथा जंतुओं के लिए आदर्श पर्यावरणीय दशाएं एवं निवास प्रदान करते हैं | मृदा में उपस्थित विभिन्न प्रकार के खनिज एवं जैविक तत्व पौधों के लिए पोषण उपलब्ध कराती है | इससे मानव समाज के लिए खाद्यान्न की आवश्यकता पूरी होती है |

                       मृदा के अवयव

 मृदा ठोस द्रव एवं गैस तीनों प्रकार के तत्वों का मिश्रण है | पृथ्वी के शैलो  से खनिज तथा जीवाणु से जैविक पदार्थ प्राप्त होता है | खनिज पदार्थ में मृदा 38% से 40% तक पाया जाता है | मृदा का ठोस भाग मृदा आयतन का लगभग 50% होता है | तथा शेष आधा भाग  मृदा घोल एवं हवा होती है | जो आपस में घटते बढ़ते रहता है | क्योंकि मृदा का जल बह जाता है | तथा पौधों द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है | 

                    मृदा निर्माण के कारक

 किसी भी क्षेत्र में  मृदाओ  के निर्माण की प्रक्रियाए उसके गुण तथा विशेषताएं मुख्य रूप से पांच कारको द्वारा निर्धारित नियंत्रित एवं प्रभावित होती है  | जो निम्नलिखित है |

                 मूल पदार्थ ( आधार शैल )

 किसी भी क्षेत्र में मृदा का निर्माण आधार शैल के अक्षय द्वारा होता   है | इस तरह मिर्जा के प्राथमिक एवं द्वितीयक खनिज आधार शैलो  से ही प्राप्त होता है |

 जैसे ज्वालामुखी चट्टान के अपक्षयन  से काली मृदा का निर्माण होता है |

                   स्थलाकृति (उच्चावच)

 चट्टानों के विघटन तथा  वियोजन से उत्पन्न असंगठित मलबे को मृदा के रूप धारण करने के लिए आवश्यक है | कि  वह एक स्थान पर जमा रह सके जहां  ढाल तीव्र होती है | वहां मलवा जब नहीं पाता इसलिए मृदा की मोटाई काफी कम होती है | जबकि समतल भूमि में मलबे के जमा होने के कारण उसकी मोटाई अधिक होती है |

                                समय

 प्रकृति के विभिन्न स्वरूपों की तरह   मृदाएं भी समय के साथ विकसित होती है | तथा इसका संगठन संरचना तथा आंतरिक विशेषताएं निरंतर परिवर्तित होती रहती है | मृदा निर्माण की सभी क्रियाएं समय के अनुसार होती है  | मृदा के पूर्ण विकसित होने तथा नष्ट होने एवं फिर नवीन मृदा निर्माण होने का चक्र  भी समय के अनुसार होता है | सभी दशाओं के अनुकूल होने पर मृदा परिच्छेदिका का विकास होने में लगभग 200 वर्ष लग जाता है |

                              जलवायु

 जलवायु मृदा में स्थित नमी की मात्रा तथा तापमान को निर्धारित एवं प्रभावित करती  हैं  | इससे अपवहन , अपक्षालन , विनिक्षेपण , हियूमसिकरण  तथा खनिजीकरण की प्रक्रिया संपन्न होती है | जो  मृदा के विभिन्न  संस्तरो  के निर्माण में सहायक होती है |

                         जैविक तत्व 

 पौधे एवं जीव जंतु मृदा निर्माण को विभिन्न प्रकार से प्रभावित करता है | मृदा के लिए प्रभावकारी जीव व पौधों की जीवन प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती है | जिसमें विशेष रूप से मृदा से सटे हुए छोटे पौधे एवं जीव सम्मिलित वनस्पति आवरण   मृदा के अपरदन को भी रोकता है | साथ ही साथ वनस्पति के सड़ने  गलने के उपरांत जैविक तत्व की वृद्धि के रूप में योगदान करता है |

                मृदा निर्माण की प्रक्रिया

                       मृदा जनिक  प्रक्रिया

 चट्टानों तथा खनिज के  ऋतुक्षरण  के  दौरान ऋतुक्षरित  खनिज  अंश और मृत एवं जीवित जीवांश पदार्थ का विषमांग  मिश्रण बनता है | जो मृदा निर्माण हेतु कच्चा माल होता है |

                              विच्छेदन

 ऋतुक्षरण के उपरांत निर्मित अपक्षयित  पदार्थ का  पुनः विच्छेदन  होता है तथा SiO2 , Fe2O3 , Al2O3  आंशिक रूप से परिवर्तित होकर मृदा कोलाइडी अंश बनाता  है | इस प्रकार  संकीर्ण खनिज तरल यौगिकों विक्षेदित  होता है |

                               संश्लेषण

विच्छेदन के दौरान बने तरल पदार्थ  संयुक्त होकर  मृतिका Fe , Al  के हाइड्रस ऑक्साइड , Ca , Mg , K , Na आदि के कार्बोनेट के ऑक्साइडो आदि का निर्माण करते हैं |

                           ह्यूमसीकरण

 मिट्टी की सतह पर एकत्रित अविघटित कार्बनिक अवशेष अपघटित होकर ह्यूमस का निर्माण करता है |

                     अपक्षालन या अपवहन

 वैसी प्रक्रिया जिसने मृदा के ऊपरी संस्तरों  की  अवयव  प्रवाहित जल के साथ निचले संस्तरों  में पहुंच जाता है | अपक्षालन या अपवहन कहलाता है | नम क्षेत्रों वाली  मृदाओ  में SiO2  की पर्याप्त मात्रा निचले संस्तर  में वह जाती है | जिसके फलस्वरूप लैटेराइट  मृदाओ  का निर्माण होता है | इसलिए ऊपरी संस्तर अवक्षालन संस्तर  कहलाता है |

                              विनिक्षेपण  

ऊपरी संस्तर से  जल द्वारा बहाकर  लाए गए पदार्थों के नीचे  संस्तरों में जमा होने की प्रक्रिया  विनिक्षेपन  कहलाता है |

                              समांगीकरण

  उपरोक्त  प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप  मृदाओ में   पृथक पृथक संस्तरो  के अवयव  भू रासायनिक क्रियाओं व  पादप तथा जंतुओं द्वारा पुनः आंशिक रूप से  मिश्रित होते हैं | तथा कभी संस्तरो  में स्पष्ट विभेदीकरण  अत्यधिक कठिन हो जाता है |

                           पोडजॉलाइजेशन

 यह  प्रक्रिया शीत एवं शीतोष्ण जलवायु वाले उन प्रदेशों में होता है जहां अत्याधिक वर्षा होते हैं  | अत्याधिक  वर्षा के कारण ह्यूमस  तथा सेस्कवी  ऑक्साइड ऊपरी संस्तरों  से अवक्षालन  द्वारा निचले संस्तरों  में चले जाते हैं | जिसके परिणामस्वरूप A संस्तर में क्ले , सैस्कवी  ऑक्साइड  तथा ह्यूमस  की कमी हो जाती है |  तथा सिलिका   सतह पर बना रहता है साथ ही  B संस्तर  में इन्हीं पदार्थों का अधिकता  हो जाती  है | इस  प्रक्रिया द्वारा निर्मित मृदाओं को पोडजॉल  मृदा कहते हैं |

                             लैटेराइजेशन

 इस प्रक्रिया मे पोडजॉलाइजेशन  से  विपरीत सिलिका तथा क्षारीय पदार्थों का निक्षालन  होता है | ये  मृदा अम्लीय होता है जिसे लैटेराइट  मृदा कहा जाता है |

                              कैल्सिफिकेशन 

 इस प्रक्रिया में मृदा में कैल्शियम लवणों का संचयन होता है | यह संचयन निक्षालन  में रुकावट कम वर्षा तथा क्षारीय पदार्थों की अधिकता के कारण होता है | 

                              सैलिनाइजेशन 

 यह प्रक्रिया शुष्क  जलवायु वाले प्रदेशों में अधिक होता है | इसमें अधिक तापक्रम कम वर्षा मृदा के अंदर अधिक लवण युक्त जल का पाया जाना जल तल का ऊंचा होना अधिक सहायक सिद्ध होता है | ऐसी  मृदाएं लवणों की अधिकता के कारण खेती के लिए बेकार हो जाती है | यह लवणीय मृदा कहलाती है | 

                            एल्केलाईजेशन

 यह प्रक्रिया सैलिनाइजेशन के समान दशाओ में होता है  अंतर सिर्फ इतना है | कि इसमें सोडियम लवणों का संचयन होता है अधिक पानी की उपस्थिति में जब कैल्शियम लवण निक्षालित  हो जाते हैं  तब लवणीय मृदाये  भी क्षारीय हो जाती है  | जो खेती के लिए  उपयोगी नहीं होती है | 

                               ग्लेजेशन 

 जलमग्न व अपचयित  अवस्थाओं में यह प्रक्रिया होती है | मृदा में भूरे रंग के संस्तरण  में  Ca ,Mg , Fe , व  Mn के अविलेय लवणों का जमाव होता है | 

                        मृदा परिच्छेदिका

 भूतल तथा उसके नीचे उपस्थित आधार शैल के ऊपरी भाग के मध्य स्थित समस्त मृदा  मंडल के लंबवत स्तरो को सामूहिक रूप से मृदा परिच्छेदिका कहा जाता है | वास्तव में यह मृदा संघटको के लंबवत वितरण का प्रतिनिधित्व करती है | सामान्यतः मृदा परिच्छेदिका में ऊपर से नीचे जाने पर जैविक पदार्थों के साथ साथ ही  वायु की मात्रा भी कम होती जाती है |

                          मृदा के प्रकार

 सर्व प्रथम वर्ष 1938 में संयुक्त राज्य अमेरिका के कृषि विभाग के वैज्ञानिक सी एफ मारबूत ने विश्व स्तर पर  मृदा को तीन भागों में विभक्त किया गया है | 

        (1) क्षेत्रीय मृदा या कटिबंधीय  मृदा

        (2)  अंत: क्षेत्रीय  मृदा

        (3) अक्षेत्रीय   मृदा 

            (1) क्षेत्रीय मृदा या कटिबंधीय  मृदा

 विश्व की प्रमुख मृदा वर्ग  क्षेत्रीय  मृदाओं के अंतर्गत आता है | इसका विस्तार सर्वाधिक क्षेत्रों में देखने को मिलता है | ये  मृदाएँ जलवायु एवं वनस्पति के दीर्घकालीन प्रभाव से पूर्ण विकसित होती है | क्योंकि इस प्रकार की मृदाओं का वितरण जलवायु व वनस्पति प्रदेशों के अनुसार मिलता है | इसलिए इसे कटिबंधीय मृदा भी कहा जाता है |

              कटिबंधीय मृदा दो प्रकार की होती है

 (1) पेडाल्फर

 (2) पेडोकल 

                         (1) पेडाल्फर

       पेडाल्फर  मृदा में लोहा एवं एलुमिनियम की मात्रा अधिक होती है | यह मृदा मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में अधिक पाई जाती है |  जहां अधिक वर्षा के कारण मृदा में अपक्षालन क्रिया तेजी से होती है |

 इस मृदा को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया गया है |

                         पोडजॉल  मृदा

 यह मृदा उत्तरी रूस उत्तरी यूरोप एवं उतरी कनाडा के टैगा जलवायु वाले क्षेत्रों में मुख्य रूप से पाई जाती है |

 इस मिट्टी की विशेषताएं -   मृदा की सतह के ऊपर सुखी तथा सड़ी गली वनस्पतियों की एक परत होती है | इसके नीचे  मृदा की पतली परत होती है | जीवाणु क्रिया कम होने के कारण ही ह्यूमस  कच्चा रहता है  | एवं जैविक पदार्थों के  सड़ने  गलने के  कारण हियूमिक  अम्ल का निर्माण होता है | जिसके कारण मृदा अम्लीय हो जाती हैं | उस मिटटी में अपक्षालन  क्रिया तीव्र गति से होती है |

 इस मिट्टी में गेहूं एवं सूरजमुखी जैसे फसलों की कृषि के प्रयास किए जा रहे हैं | अपक्षालन की अभिक्रिया एवं अम्लीय होने के कारण यह  मिट्टी काफी कम उपजाऊ होती है |

                             लाल  मृदा

 यह मिट्टी उष्ण  एवं उपोष्ण कटिबंधो के आर्द्र भागों में विस्तृत रूप से पाई जाती है |

 इस मिट्टी की विशेषताएं लोहे के ऑक्साइड के कारण इस मिट्टी का रंग लाल होता है | जीवाणु की क्रिया काफी तीव्र गति से होने के कारण जीवाणु द्वारा ही ह्यूमस  का उपयोग कर लिया जाता है | जिसके फलस्वरूप इस मिट्टी में ही ह्यूमस  की कमी आ जाती है |  अधिक वर्षा के कारण अपक्षालन  की क्रिया भी तीव्र  गति से होती है | जिसके कारण इसकी मिट्टी में उर्वरा शक्ति की मात्रा कम होती है |

 इस मिट्टी में परंपरागत रूप से मोटे अनाजों की कृषि की जाती है | वर्तमान समय में इस मिट्टी में रबड़ एवं कहवा की बागवानी कृषि की जा रही है | 

                             लैटेराइट मिट्टी

 यह मिट्टी अनूपजाऊ होती है |   तथा  यह आर्द एवं उष्ण जलवायु जैसी विषुवत रेखीय जलवायु  सवाना एवं मानसूनी जलवायु के आर्द्र भागो में पाई जाती हैं |

 इस  मिट्टी की विशेषताएं  अपक्षालन  तीव्र प्रक्रिया के कारण इस मिट्टी में सिलिका एवं पोषक तत्वों का अभाव होता है | अधिक वर्षा एवं गर्मी के कारण जीवाणु क्रिया तेजी से होती है | एवं जीवाणु द्वारा ह्यूमस का उपयोग कर लिया जाता है | जिसके फलस्वरूप इसमें उर्वरा शक्ति की मात्रा काफी कम हो जाती है |

 इस मिट्टी में मोटे अनाजों दलहन तिलहन एवं बागवानी फसलों की कृषि की जाती है | यह मिट्टी जंगली वृक्षों  घास एवं झाड़ियों के लिए उपयुक्त है |

                             काली मिट्टी

 यह मिट्टी काले रंग की तथा उपजाऊ होती है | तथा यह समशीतोष्ण कटिबंध  की महादेशीय जलवायु के क्षेत्र में पाई जाती है | रूस के स्टेपी क्षेत्र  एवं उत्तरी अमेरिका के प्रेयरी  क्षेत्र में यह मिट्टी विस्तृत रूप में पाई जाती है | इसके अलावा अर्जेंटीना के पंपास दक्षिण अफ्रीका के बेल्ड एवं ऑस्ट्रेलिया के डाउन्स के मैदानों में भी या  मिट्टी पाई जाती है | 

 इस मिट्टी की विशेषताएं हल्की वर्षा के कारण इस मिट्टी में अपक्षालन की क्रिया नहीं होती है |  घास के सड़ने गलने  के कारण इस मिट्टी में कैल्शियम की प्रचुरता होती है |  इस मिट्टी में ह्यूमस  पर्याप्त मात्रा में रहती है  | जिसके कारण यह मिट्टी उपजाऊ होती है  | इस मिट्टी को रोटी की टोकरी कहा जाता है | 

 इस मिट्टी में मुख्य रूप से गेहूं , जौ , जई , जैसे फसलों की कृषि की जाती है | 

                       (2) पेडोकल  मृदा

     पेडोकल मृदाओं  में कैल्शियम की मात्रा अधिक होती है | यह  मृदाएं शुष्क एवं  अर्ध शुष्क देशों में पाई जाती है | क्षेत्रों में  वाष्प  उत्सर्जन की क्रिया वर्षण की तुलना में कुछ अधिक होती है | जिसके फलस्वरूप केशिका कर्षण  क्रिया के द्वारा कैल्शियम ऊपर चला जाता है |

            (2)  अंत: क्षेत्रीय  मृदा 

    अंत: क्षेत्रीय  मृदा  को निम्न भागों में बांटा जा सकता है

                        लवणीय मृदा

 इस प्रकार की मिट्टी उन क्षेत्रों में मिलती है | जहां वाष्पीकरण की क्रिया अधिक होती है | एवं जल निकासी का उचित सुविधा का अभाव होता है | जहां ग्रीष्म ऋतु काफी गर्म एवं शुष्क होती है  |    वहां लवणीय मृदा पाई जाती है | 

                            क्षारीय मृदा

 यह मृदा लवणीय मृदा वाले क्षेत्रों में है |  लेकिन कुछ अधिक वर्षा वाले भागों में मिलती है |

 इस मिट्टी में सामान्यतः कोई मुख्य फसल की कृषि संभव नहीं हो पाती है | हालांकि कुछ जगहों पर नारियल तथा खजूर को बागानी कृषि के तहत उगाया जाता है | 

                   (3) अक्षेत्रीय   मृदा 

        अक्षेत्रीय   मृदा  को निम्न भागों में बांटा गया है

                        जलोढ़ मिट्टी

 विश्व की सभी बड़ी नदियों की घाटियों में यह मिट्टी पाई जाती है | इसका उत्तम उदाहरण है , नील नदी की घाटी गंगा ब्रह्मपुत्र के मैदानी भाग इत्यादि |  यह मिट्टी आवश्यक खनिज तत्वों की दृष्टि से धनी होती है | मृदा की गहराई भी अधिक होती है | यह विश्व की सर्वाधिक उपजाऊ मृदाओ में से एक है |

 चावल एवं जूट की कृषि के लिए  यह मिट्टी विशेष रूप से उपयोगी होती है | इसके अलावा गेहूं गन्ना कपास  आदि फसलो की कृषि भी की जाती है |

                            लोएस मिट्टी

 इस मिट्टी का सबसे विस्तृत क्षेत्र उत्तर पश्चिम  चीन में है | जहां  मध्य एशिया एवं मुख्य रूप से गोबी मरुस्थल से  वायु द्वारा लाए गए धूल कणों के द्वारा इसका निर्माण हुआ है  |

                         पर्वतीय मृदा

 यह मिट्टी विश्व के अधिकांश पर्वतों की  ढालो एवं पर्वतीय प्रदेशों में पाई जाती है | 

 अनुकूल ढाल वाले क्षेत्रों में इस मिट्टी में बागानी फसलों की कृषि की जाती है | चाय मसाला रसदार फल कहवा और रबड़ आदि इस मिट्टी में उपजाए जाते हैं  |


                      

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