शनिवार, 26 जून 2021

पवन किसे कहते हैं, पवन को प्रभावित करने वाले कारकों को लिखें, पवनों का वर्गीकरण करें

               पवन





 पृथ्वी की सतह पर जो  वायु चलती है उसे पवन कहा जाता है | वायुदाब के भिन्नता के कारण  पवन चलती है | वायुदाब में जितनी अधिक  विभिन्नता होगी  अथवा  समदाब रेखाएं जितनी अधिक निकट होगी पवन उतनी ही अधिक तेजी से चलेगी | 

        पवन को प्रभावित करने वाले कारक

    पवन को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित है

                  (1)  दाब प्रवणता बल

 वायुमंडलीय दाब के विभिन्नता के कारण एक बल उत्पन्न होता है | दूरी के संदर्भ में दाब परिवर्तन की दर को दाब प्रवणता कहा जाता है | जहां  समदाब रेखाएं पास पास होती है | वहां दाब प्रवणता अधिक है और जहां समदाब रेखाएं दूर-दूर होती है | वहां  दाब प्रवणता कम होती है |

                       (2)  घर्षण बल

 यह पवनों की गति को अधिक प्रभावित करता है | क्योंकि धरातल पर घर्षण बल सर्वाधिक होता है | इसका प्रभाव 1 से 3 किमी की ऊंचाई तक होता है | इसलिए धरातलीय सतह पर पवनो का वेग , घर्षण बल से प्रभावित होता है | जबकि समुद्री सतह में घर्षण बल कम होता है | जिसके कारण यहां पवनों का वेग  कम प्रभावित होता है |

 पृथ्वी के परिभ्रमण के कारण पवन कभी उच्च दाब क्षेत्र से निम्न दाब क्षेत्र की ओर सीधी नहीं जाती है | फेरल नियम (  इस नियम के अनुसार सभी वायु राशियों पृथ्वी की दैनिक गति के कारण उत्तरी गोलार्ध में दाई ओर मुड़ जाती हैं )  के अनुसार पवनों अपना मार्ग परिवर्तित कर लेती है |

 इस परिवर्तन का कारण कोरिऑलिस बल है | जो पृथ्वी के घूर्णन के कारण उत्पन्न अपकेंद्रीय शक्ति का  परिणाम है सर्वप्रथम 1844 ई. में फ्रांसीसी वैज्ञानिक कोरिऑलिस ने इसके विषय में विवरण प्रस्तुत किया इन्हें के नाम पर इस  बल को कोरिऑलिस बल कहा जाता है |

 इस प्रभाव से  पवन उत्तरी  गोलार्ध में अपनी मूल  दिशा में दाहिने ओर व दक्षिणी  गोलार्ध में अपने बाई ओर भी  विजयपथ विक्षेपित  हो जाती है | कोरिऑलिस बल  ध्रुवों पर सर्वाधिक और  विषुवत रेखा पर बहुत कम होता है | 

                       पवनों का वर्गीकरण

 पवनों की अवधि के अनुसार उसे दो वर्गों में बांटा जा सकता है

           (1)  स्थायी  पवन  (2) स्थानीय पवन  

                       (1)  स्थायी  पवन 

      स्थायी  पवन   तीन प्रकार के होते हैं

    (ii)  व्यापारिक पवन (ii)  पछुआ पवन (iii)  ध्रुवीय पवन

                         (i)  व्यापारिक पवन

 जब   विषुवतीय  वायुपेटी से वायु  ऊपर उठकर ध्रुवों की ओर चलती है |  लेकिन 30° डिग्री उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांश पर वायुदाब अधिक हो जाती है | जिसके कारण हवाएं नीचे उतरकर एकत्रित हो जाती है |पृथ्वी के अपने धुरी पर घूमने के कारण ध्रुवों की हवाएं भी 30°  दक्षिणी व उत्तरी अक्षांश पर एकत्र हो जाती है|

 यहां एकत्रित हुई हवाएं अधिक  दाब के कारण कम दाब की ओर चलती है | इस प्रकार जो पवन उपोष्ण उच्च दाब पेटियों से भूमध्य रेखा की ओर आती है | सन्मार्गी  पवन कहलाती है | सन्मार्गी  पवने  उत्तरी गोलार्ध में  उत्तरी - पूर्वी सन्मार्गी  पवनो  के नाम से विख्यात है |

 जब सूर्य कर्क रेखा पर सीधा चमकता है | तो ए पवन 40° उत्तरी अक्षांश से भूमध्य रेखा की ओर चलती है | दक्षिणी गोलार्ध में इसकी दिशाएं दक्षिण पूर्व होने के कारण के दक्षिणी पूर्वी सन्मार्गी  पवनो  के नाम से विख्यात है | 

                           (ii)  पछुआ पवन

 ये  उपोष्ण उच्च   वायुदाब से उप ध्रुवीय निम्न वायुदाब की ओर चलने वाली पवन है  | दक्षिणी गोलार्ध में समुद्र का विस्तार अधिक होने के कारण ये  पवन निरंतर निर्बाध गति से चलती रहती है |  और अधिक शक्तिशाली होती है | ये  पवन 40° दक्षिणी अक्षांश से 65° दक्षिणी अक्षांश कीमत क्षेत्रों में पूर्णता है | विकसित होती है दक्षिणी गोलार्ध में इस पवन का गति तीव्र होती है | जिसके कारण इसको गरजने वाला चालीसा, भयानक पचासा, तथा चीखता साठा कहते हैं यह काफी खतरनाक होती है | जिसके कारण नाविक इन पावनों से बहुत अधिक डरते हैं | क्योंकि कभी-कभी इस समुद्री जहाजों को डुबो देती है | 

                            (iii)  ध्रुवीय पवन

ये  पवन अधिक ठंडी होती है | ये  पवन  ध्रुवीय  उच्च वायुदाब से उप ध्रुवीय निम्न वायुदाब की ओर उत्तरी गोलार्ध में उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम  तथा  दक्षिणी  गोलार्ध में  दक्षिण पूर्व से दक्षिण पश्चिम चलती है | इन तीनों ग्रहीय पावनो के धरातलीय व उच्चतलीय  प्रवाह के  अंतर संबंधित प्रारूप के कारण दोनों गोलार्ध में तीन तरह की कोशिकाओं का निर्माण होता है | जिसे क्रमश:  हैडले , फेरेल , व  ध्रुवीय कोशिका कहते हैं |

                        (2) स्थानीय पवन  

 किसी स्थान विशेष में स्थानीय कारणों से उत्पन्न अनियमित हवाओ को स्थानीय पवन कहते है | हालाँकि सागर व स्थल समीर  एवं पर्वत व  घाटी समीर निर्मित स्थानीय पवने है | भूतल के गरम व  ठंडे होने से उत्पन्न  विभिन्नता  तथा दैनिक व वार्षिक चक्रों के विकास से  बहुत से स्थानीय  व क्षेत्रिय पवने प्रवाहित होती है | 

                     (i) मानसून पवने 

 ग्लोब की उन सभी भागों की हवा को जिसकी दिशा में ऋतु के अनुसार पूर्ण प्रत्यावर्तन की स्थिति आ जाती है मानसून कहलाता है | मानसून हवा की एकमात्र विशेषता दिशा परिवर्तन ही नहीं है | सामान्य रूप में मानसून हवाएं धरातल की संवहनीय  क्रम ही  है | जिसका आविर्भाव स्थल तथा  जल के विरोधी स्वभाव के कारण तथा तापीय विभिनता के कारण होता है | वैसे भाग जहां पर मानसून हवाओं का अधिकता  होता है | मानसूनी जलवायु प्रदेश कहलाता है | ग्लोब पर मानसूनी जलवायु का सर्वाधिक विकास दक्षिण पूर्वी एशिया तथा चीन एवं जापान पर हुआ है | इसके अलावा गिनी की खाड़ी वाला  पश्चिम अफ्रीका का भाग अयणवर्ती ,  पूर्वी अफ्रीका ,  अयणवर्ती  उत्तरी ऑस्ट्रेलिया , दक्षिण पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका , खासकर खाड़ी के समीप प्रान्त  आदि मानसूनी जलवायु के अंतर्गत आते हैं |

              (ii) स्थल व समुद्र समीर 

 ऊष्मा  के अवशोषण तथा स्थानांतरण के कारण स्थल व  समुद्र में विविधता पाई जाती है  | दिन के समय स्थल भाग समुद्र की अपेक्षा अधिक गर्म हो जाती है | अतः  स्थल पर हवाएँ   ऊपर उठती और निम्न दाब क्षेत्र बन जाती है | जबकि समुद्र अपेक्षाकृत अधिक ठंडे रहता है | और उस पर उच्च वायुदाब बना रहता है |  जिसके कारण समुद्र से स्थल की और दाब प्रवणता उत्पन्न होती है | और पवन समुद्र से स्थल की ओर समुद्री समीर के रूप में प्रवाहित होती है | रात के समय एकदम विपरीत प्रक्रिया होती है | स्थल समुद्री की अपेक्षा अधिक ठंडा होती है | जिसके कारण दाब प्रवणता स्थल से समुद्र की ओर होने पर स्थल समीर प्रवाहित होती है | 

              (iii)  पर्वत व  घाटी समीर

 दिन के समय पर्वतीय प्रदेशों में  ढाल अधिक गर्म हो जाती है | जिससे  ढाल पर निम्न दाब और घाटी में उच्च दाब बन जाता है | जिसके परिणामस्वरूप वायु  ढाल के साथ-साथ ऊपर उठते हैं | और इस खाली स्थान को भरने के लिए  वायु  घाटी की ओर से बहती  है |  इस पवन को घाटी समीर कहते हैं |

 इसी प्रकार रात के समय पर्वतीय ढाल अधिक ठंडी हो जाती है | जिसके कारण ढाल पर उच्च दाब और घाटी में  निम्न दाब बन जाता है | जिसके परिणाम स्वरूप सघन वायु  घाटी में नीचे उतरती है | जिसे पर्वतीय पवन कहते हैं  | उच्च  पठारों व  हिम  क्षेत्रों से घाटी में बहने वाली ठंडी वायु को और अवरोही  पवन कहते हैं |  पर्वत श्रेणियों के पवनविमुख ढालो पर एक अन्य प्रकार की उष्ण  पवन प्रवाहित होती है | जिसे आरोही पवन कहते हैं | जब ये  पवन पवनविमुख  ढालो पर नीचे उतरती है | तब ये शुष्क पवन रुद्धोष्म प्रक्रिया से गर्म हो जाती है | ये शुष्क  हवाएं कम समय में बर्फ को पिघला सकते हैं |


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

प्राकृतिक संसाधन किसे कहते है ?प्राकृतिक संसाधन के बारे में वर्णन करें

               प्राकृतिक संसाधन किसे  कहते हैं ?   किसी देश की अर्थव्यवस्था वहां पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर करती है इसलिए उनकी स...