सोमवार, 31 मई 2021

पाषाण काल किसे कहते हैं ? पुरापाषाण काल किसे कहते है, मध्य पाषाण काल क्या है,नवपाषाण काल क्या है

        पाषाण काल 

 आदिकाल में मानव का जीवन पाषाण निर्मित उपकरणों पर  निर्भर करता था मानव सभ्यता के इस आदिकाल को  पाषाण काल कहा जाता है |
     पाषाण काल को  अच्छे से  समझने  के लिए इसे तीन काल खंडों में वर्गीकृत किया गया है  - 

  ( 1 )  पुरापाषाण काल 

  ( 2 )   मध्य पाषाण काल 

  ( 3 ) नवपाषाण काल 
             

         पुरापाषाण काल ( 10 लाख से 50 हजार  ई.पू.)


सन 1863 ई.  रॉबर्ट ब्रूस फुट  ने भारत की प्रथम पुरापाषाणकालीन संस्कृति की खोज की मानव की| आरंभिक गतिविधियां पुरापाषाण काल में अभिव्यक्त होने लगती है| इस काल में मनुष्य अपनी जीविका उपार्जन के लिए शिकार और खाद्य संग्रह पर निर्भर था | पुरापाषाण काल में शुतुरमुर्ग के अवशेष पटने महाराष्ट्र से प्राप्त हुआ है  मानव सामान्यतः पहाड़ की गुफा तथा खुले आकाश के नीचे अपना जीवन  व्यतीत करता था |
      पुरापाषाण काल से संबंधित स्थलों की सूचना संपूर्ण भारतीय महाद्वीपों से मिलती है  | पुरापाषाण काल  के मानव संभवत  नीग्रिटो प्रजाति के थे  | पुरापाषाण काल के पूरास्थलों से प्राप्त पत्थर  के औजार उस समय के महत्व को बताता है  | मानव द्वारा  बनाया  जाने वाला  प्रथम औजार कुल्हाड़ी था |
              तकनीकी विकास तथा जलवायु में होने वाले परिवर्तनों के आधार पर पुरापाषाण काल को तीन भागों में बांट सकते हैं -

 ( 1 )  निम्न पुरापाषाण काल 

 (  2 )  मध्य पुरापाषाण काल 

 (  3 ) उच्य पुरापाषाण काल

     ( 1 )  निम्न पुरापाषाण काल ( 10 लाख से 50 हजार ई.पू.)

        निम्न पुरापाषाण काल का  अधिकांश भाग ठंडी जलवायु से संबंध था तथा   क्रोड उपकरणों की प्रधानता थी | हस्त कुठार ,  खंडक तथा  बिदारिणी  इस काल के मुख्य उपकरण थे जो क्वाटर्जाइट  पत्थरों से बनाया जाता था | 
       सोहन घाटी , बेलन घाटी ,  आजमगढ़ , भीमबेटका ,  नेवासा आदि इस  काल के महत्वपूर्ण स्थल थे | 

      (  2 )  मध्य पुरापाषाण काल ( 50 हजार से   40 हजार ई.पू. )

     मध्य पुरापाषाण काल में मानव जीवन  अस्थिर था  | लेकिन उपकरण  पहले की अपेक्षा छोटे सुन्दर और पैने बनने लगे थे |  इस काल में उद्योग मुख्यता पत्थर की बनी वस्तुओं का था |  पत्थर  के 
 बने विभिन्न प्रकार के फलक , वेधनी , छेदनी , और खुरचनी इस काल  के   प्रमुख औजार  था | 


                      ( 3)  उच्च  पुरापाषाण काल ( 40 हजार से 10 हजार ई. पू.  )


 उच्च पुरापाषाण काल में जलवायु शुष्क हो गई थी | यह काल आधुनिक मानव अर्थात होमो सेपियंस के अस्तित्व का युग था | इस काल के उपकरणों में तक्षणी एवं खुर्चणाी के अलावा अस्थि के उपकरणों की महत्वपूर्ण भूमिका हो गई थी  | उपकरण बनाने की मुख्य सामग्री लंबे स्थूल प्रस्तर फलक होते थे  |
       इस काल में मानव रहने के लिए शैलास्रयो  का प्रयोग होने लगा | साथ ही नक्काशी एवं चित्रकारी दोनों रूप में कला का विकास हुआ | बेलन घाटी ,  छोटा नागपुर का पठार , मध्य भारत , कुर्नूल , चितुर , गुजरात इत्यादि इस काल के प्रमुख स्थल  थे |

                 ( 2 )   मध्य पाषाण काल  


   मघ्य पाषाण काल   पुरापाषाण काल और नवपाषाण काल का संक्रमण काल है | मध्य पाषाण काल में लोग शिकार करके मछली पकड़ कर और खाद्य वस्तुएं बटोर कर पेट भरा करता था | इस काल में पाषाण के औजार मुख्य रूप से बहुत छोटे होते थे जिसे माइक्रोलिथ यानी लघु पाषाण कहा जाता है |  प्राय: इन औजारों में हड्डियों या लकड़ियों के मुट्ठे लगे हाशिया और आरी जैसे औजार मिलते थे|
     सर्वप्रथम तीर कमान का विकास इसी काल में हुआ | पशुपालन का प्रारंभिक साक्ष्य भी इसी काल में मध्य प्रदेश के आजमगढ़ तथा राजस्थान की बागोर से प्राप्त हुआ है | मानव द्वारा पालतू बनाया गया पहला पशु कुत्ता था   | स्थाई निवास का प्रारंभिक  साक्ष्य सराय नाहर सराय  एवं महादहा से स्तमगर्त  के रूप में मिला है |  मातृ देवी की उपासना था शवाधान  पद्धति का विकास संभवत: इसी काल में प्रारंभ हुआ | भीमबेटका से चित्रकारी के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त होते हैं |  इस काल के गुफा चित्रों में हिरण की आकृति सबसे अधिक देखने को मिलती है |

            ( 3 ) नवपाषाण काल  

 नवपाषाण काल के लिए नियोलिथिक का सर्वप्रथम प्रयोग सर जाॉन लुबाक ने 1865 ई.  मे किया था  | सर्वप्रथम 1860 ई. मे ली मेसुरिचर   इस काल का प्रथम प्रस्तर उपकरण उत्तर प्रदेश की टोंस नदी की घाटी से प्राप्त किया |  इस काल केन  निवासी  सबसे पुराने कृषक समुदाय के थे बे मिट्टी और सरकंडे के बने गोलाकार या आयताकार घरों में रहते थे |  सर्वप्रथम मानव इस काल में शिकार एवं खाद्य संग्राहक से खाद्य उत्पादक की स्थिति में पहुंचा | मानव द्वारा सर्वप्रथम प्रयुक्त अनाज जौ था | उत्तर - पश्चिम के सुलेमान एवं किरथर पहाड़ी क्षेत्र में  बोलन दर्रे के पास मेहरगढ़ एक हरा भरा समतल स्थान है | यहां  के स्त्री - पुरुषों ने सबसे पहले जौ , गहूँ ,  उगाना और भेड़ - बकरी पालना सीखा |  यहां से हिरण ,  सूअर , भेड़ तथा बकरियों की हड्डियां मिली है यहां से प्राप्त चौकोर तथा आयताकार घरों में चार या उससे ज्यादा कमरे हैं |  मोहनगढ़ से एक ऐसी  कब्र मिली है  जहां मृतक के साथ एक बकरी को भी दफनाया गया था | कुम्भकारी (मृदभाण्ड)  प्रचलन नियमित रूप से इसी काल में हुआ   | कोल्डिहवा से  चावल एवं चौपानीमाण्डा से मृदभाण्ड का  प्राचीनतम साक्ष्य मिला है इस काल में ओखली और मुसल का प्रयोग किया जाता था  | नवपाषाण काल का  अंत होते होते धातु का प्रयोग शुरु हो गया था |

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