पाषाण काल
आदिकाल में मानव का जीवन पाषाण निर्मित उपकरणों पर निर्भर करता था मानव सभ्यता के इस आदिकाल को पाषाण काल कहा जाता है |
पाषाण काल को अच्छे से समझने के लिए इसे तीन काल खंडों में वर्गीकृत किया गया है -
( 1 ) पुरापाषाण काल
( 2 ) मध्य पाषाण काल
( 3 ) नवपाषाण काल
पुरापाषाण काल ( 10 लाख से 50 हजार ई.पू.)
सन 1863 ई. रॉबर्ट ब्रूस फुट ने भारत की प्रथम पुरापाषाणकालीन संस्कृति की खोज की मानव की| आरंभिक गतिविधियां पुरापाषाण काल में अभिव्यक्त होने लगती है| इस काल में मनुष्य अपनी जीविका उपार्जन के लिए शिकार और खाद्य संग्रह पर निर्भर था | पुरापाषाण काल में शुतुरमुर्ग के अवशेष पटने महाराष्ट्र से प्राप्त हुआ है मानव सामान्यतः पहाड़ की गुफा तथा खुले आकाश के नीचे अपना जीवन व्यतीत करता था |
पुरापाषाण काल से संबंधित स्थलों की सूचना संपूर्ण भारतीय महाद्वीपों से मिलती है | पुरापाषाण काल के मानव संभवत नीग्रिटो प्रजाति के थे | पुरापाषाण काल के पूरास्थलों से प्राप्त पत्थर के औजार उस समय के महत्व को बताता है | मानव द्वारा बनाया जाने वाला प्रथम औजार कुल्हाड़ी था |
तकनीकी विकास तथा जलवायु में होने वाले परिवर्तनों के आधार पर पुरापाषाण काल को तीन भागों में बांट सकते हैं -
( 1 ) निम्न पुरापाषाण काल
( 2 ) मध्य पुरापाषाण काल
( 3 ) उच्य पुरापाषाण काल
( 1 ) निम्न पुरापाषाण काल ( 10 लाख से 50 हजार ई.पू.)
निम्न पुरापाषाण काल का अधिकांश भाग ठंडी जलवायु से संबंध था तथा क्रोड उपकरणों की प्रधानता थी | हस्त कुठार , खंडक तथा बिदारिणी इस काल के मुख्य उपकरण थे जो क्वाटर्जाइट पत्थरों से बनाया जाता था |
सोहन घाटी , बेलन घाटी , आजमगढ़ , भीमबेटका , नेवासा आदि इस काल के महत्वपूर्ण स्थल थे |
( 2 ) मध्य पुरापाषाण काल ( 50 हजार से 40 हजार ई.पू. )
मध्य पुरापाषाण काल में मानव जीवन अस्थिर था | लेकिन उपकरण पहले की अपेक्षा छोटे सुन्दर और पैने बनने लगे थे | इस काल में उद्योग मुख्यता पत्थर की बनी वस्तुओं का था | पत्थर के
बने विभिन्न प्रकार के फलक , वेधनी , छेदनी , और खुरचनी इस काल के प्रमुख औजार था |
( 3) उच्च पुरापाषाण काल ( 40 हजार से 10 हजार ई. पू. )
उच्च पुरापाषाण काल में जलवायु शुष्क हो गई थी | यह काल आधुनिक मानव अर्थात होमो सेपियंस के अस्तित्व का युग था | इस काल के उपकरणों में तक्षणी एवं खुर्चणाी के अलावा अस्थि के उपकरणों की महत्वपूर्ण भूमिका हो गई थी | उपकरण बनाने की मुख्य सामग्री लंबे स्थूल प्रस्तर फलक होते थे |
इस काल में मानव रहने के लिए शैलास्रयो का प्रयोग होने लगा | साथ ही नक्काशी एवं चित्रकारी दोनों रूप में कला का विकास हुआ | बेलन घाटी , छोटा नागपुर का पठार , मध्य भारत , कुर्नूल , चितुर , गुजरात इत्यादि इस काल के प्रमुख स्थल थे |
( 2 ) मध्य पाषाण काल
मघ्य पाषाण काल पुरापाषाण काल और नवपाषाण काल का संक्रमण काल है | मध्य पाषाण काल में लोग शिकार करके मछली पकड़ कर और खाद्य वस्तुएं बटोर कर पेट भरा करता था | इस काल में पाषाण के औजार मुख्य रूप से बहुत छोटे होते थे जिसे माइक्रोलिथ यानी लघु पाषाण कहा जाता है | प्राय: इन औजारों में हड्डियों या लकड़ियों के मुट्ठे लगे हाशिया और आरी जैसे औजार मिलते थे|
सर्वप्रथम तीर कमान का विकास इसी काल में हुआ | पशुपालन का प्रारंभिक साक्ष्य भी इसी काल में मध्य प्रदेश के आजमगढ़ तथा राजस्थान की बागोर से प्राप्त हुआ है | मानव द्वारा पालतू बनाया गया पहला पशु कुत्ता था | स्थाई निवास का प्रारंभिक साक्ष्य सराय नाहर सराय एवं महादहा से स्तमगर्त के रूप में मिला है | मातृ देवी की उपासना था शवाधान पद्धति का विकास संभवत: इसी काल में प्रारंभ हुआ | भीमबेटका से चित्रकारी के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त होते हैं | इस काल के गुफा चित्रों में हिरण की आकृति सबसे अधिक देखने को मिलती है |
( 3 ) नवपाषाण काल
नवपाषाण काल के लिए नियोलिथिक का सर्वप्रथम प्रयोग सर जाॉन लुबाक ने 1865 ई. मे किया था | सर्वप्रथम 1860 ई. मे ली मेसुरिचर इस काल का प्रथम प्रस्तर उपकरण उत्तर प्रदेश की टोंस नदी की घाटी से प्राप्त किया | इस काल केन निवासी सबसे पुराने कृषक समुदाय के थे बे मिट्टी और सरकंडे के बने गोलाकार या आयताकार घरों में रहते थे | सर्वप्रथम मानव इस काल में शिकार एवं खाद्य संग्राहक से खाद्य उत्पादक की स्थिति में पहुंचा | मानव द्वारा सर्वप्रथम प्रयुक्त अनाज जौ था | उत्तर - पश्चिम के सुलेमान एवं किरथर पहाड़ी क्षेत्र में बोलन दर्रे के पास मेहरगढ़ एक हरा भरा समतल स्थान है | यहां के स्त्री - पुरुषों ने सबसे पहले जौ , गहूँ , उगाना और भेड़ - बकरी पालना सीखा | यहां से हिरण , सूअर , भेड़ तथा बकरियों की हड्डियां मिली है यहां से प्राप्त चौकोर तथा आयताकार घरों में चार या उससे ज्यादा कमरे हैं | मोहनगढ़ से एक ऐसी कब्र मिली है जहां मृतक के साथ एक बकरी को भी दफनाया गया था | कुम्भकारी (मृदभाण्ड) प्रचलन नियमित रूप से इसी काल में हुआ | कोल्डिहवा से चावल एवं चौपानीमाण्डा से मृदभाण्ड का प्राचीनतम साक्ष्य मिला है इस काल में ओखली और मुसल का प्रयोग किया जाता था | नवपाषाण काल का अंत होते होते धातु का प्रयोग शुरु हो गया था |
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